नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क : ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर तनाव के बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि अगर अमेरिका सैन्य बल के जरिए ईरान के समृद्ध यूरेनियम भंडार पर कब्जा करना चाहे, तो क्या होगा?
विशेषज्ञों का साफ कहना है कि यह एक कदम न सिर्फ बेहद जटिल और लंबा आपरेशन होगा, बल्कि इसमें रेडिएशन, रासायनिक खतरे और भारी सैन्य नुकसान का जोखिम भी शामिल है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप लगातार यह कहते रहे हैं कि ईरान को कभी परमाणु हथियार नहीं बनाने दिया जाएगा, लेकिन यह अभी स्पष्ट नहीं है कि अमेरिका इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए कितना आगे जाएगा।
परमाणु बम के बेहद करीब ईरान
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के अनुसार, ईरान के पास लगभग 440.9 किलोग्राम यूरेनियम है, जो 60 प्रतिशत तक समृद्ध है। यह स्तर 90 प्रतिशत (हथियार-ग्रेड) से बस एक तकनीकी कदम दूर है।
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईईए) प्रमुख राफेल ग्रासी के अनुसार, यह भंडार सैद्धांतिक रूप से करीब 10 परमाणु बम बनाने की क्षमता रखता है, हालांकि इसका मतलब यह नहीं कि ईरान के पास पहले से परमाणु हथियार मौजूद हैं।
सुरंगों में छिपा परमाणु भंडार
आईएईए निरीक्षकों को जून 2025 के बाद से उच्च समृद्ध यूरेनियम के भंडार की पुष्टि करने का मौका नहीं मिल पाया है, क्योंकि अमेरिकी और इजरायली हमलों के बाद निगरानी व्यवस्था बाधित हो गई। रिपोर्ट के अनुसार, करीब 200 किलोग्राम यूरेनियम इस्फहान के पास स्थित परमाणु परिसर की सुरंगों में छिपा हो सकता है।
इसके अलावा कुछ मात्रा नतांज में मौजूद बताई जा रही है, जबकि एक हिस्सा फोर्दो में होने की भी संभावना है। हालांकि, यह भी आशंका जताई गई है कि यूरेनियम का कुछ भंडार अन्य गुप्त स्थानों पर रखा गया हो सकता है।
रेडिएशन और रासायनिक खतरे
यूरेनियम को यूरेनियम हेक्साफ्लोराइड गैस के रूप में स्टील कंटेनरों में रखा जाता है, जिनका वजन करीब 50 किलोग्राम होता है। विशेषज्ञों के मुताबिक, यदि ये कंटेनर क्षतिग्रस्त हो जाएं तो फ्लोरीन गैस का रिसाव हो सकता है, जो त्वचा, आंखों और फेफड़ों के लिए बेहद खतरनाक होती है।
ऐसी स्थिति में किसी भी आपरेशन के दौरान सैनिकों को विशेष सूट पहनना अनिवार्य होगा। साथ ही कंटेनरों को एक-दूसरे से सुरक्षित दूरी पर रखना होगा, ताकि किसी तरह की खतरनाक परमाणु प्रतिक्रिया का जोखिम न बने।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि अमेरिका जमीनी स्तर पर कार्रवाई करता है तो यह बेहद जटिल और जोखिम भरा मिशन होगा। इसमें करीब 1000 सैनिकों की जरूरत पड़ सकती है। भारी मशीनरी को हेलीकाप्टर के जरिए लाना होगा और सुरंगों तक पहुंचने के लिए खुदाई करनी पड़ेगी।
धोखे, जाल और छिपे खतरे
विशेषज्ञों का मानना है कि इस पूरे ऑपरेशन में कई जटिल चुनौतियां सामने आ सकती हैं। असली और नकली कंटेनरों में फर्क करना मुश्किल होगा, जबकि सुरंगों में जाल (बूबी ट्रैप) लगाए जाने की आशंका भी है। साथ ही, यह माना जा रहा है कि ईरान ने ऐसे किसी आपरेशन को कठिन बनाने के लिए पहले से पूरी तैयारी कर रखी होगी।
ऐसे हालात में विशेषज्ञ बेहतर विकल्प के तौर पर कूटनीतिक रास्ता सुझाते हैं। उनके मुताबिक, सबसे सुरक्षित तरीका यह होगा कि पहले ईरान के साथ समझौता किया जाए और फिर यूरेनियम को सुरक्षित तरीके से बाहर निकाला जाए।
