नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क : अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच युद्ध के चलते हुए एक महीने से ज्यादा का समय बीत गया है। पश्चिम एशिया में जैसे-जैसे बम गिर रहे हैं, उतनी ही तेजी के साथ दुनिया के सभी देशों पर प्रतिबंधों का असर बढ़ रहा है।
युद्ध के चलते सभी पाबंदियों के बावजूद भारत और ईरान के बीच रिश्ते गहरे हुए हैं। ईरान ने कहा है कि युद्ध के दौरान भारत के साथ उसका आर्थिक जुड़ाव स्थिर रहेगा और हालात सामान्य होने पर इसमें तेजी भी आएगी।
भारत-ईरान के बीच मजबूत होंगे रिश्ते
भारत में ईरान के राजदूत, मोहम्मद फथाली ने टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में बताया, ‘युद्ध के समय आने वाली रुकावटें महज छोटी-मोटी बाधाएं हैं और तेहरान का ईरान-भारत आर्थिक संबंधों के भविष्य को लेकर नजरिया, यहां तक कि युद्ध के दौरान भी और खासकर युद्ध के बाद के समय में सकारात्मक और विस्तारवादी बना हुआ है।’
फथाली ने कहा, ‘हमारे दोनों देशों के बीच आर्थिक सहयोग आपसी हितों और भरोसे पर आधारित है। इसमें आने वाले समय में और अधिक विकास की काफी संभावनाएं हैं।’
चाबहार बंदरगाह- रिश्ते की मजबूत डोर
चाबहार बंदरगाह के बारे में बात करते हुए ईरानी राजदूत ने कहा, ‘दोनों देशों के रिश्तों में चाबहार बंदरगाह एक रणनीतिक परियोजना के तौर पर, ईरान, भारत और इस क्षेत्र के बीच व्यापार और आवागमन के संबंधों को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाता है।’
ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर स्थित चाबहार लंबे समय से भारत के लिए जमीन से घिरे अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने का एक रणनीतिक वैकल्पिक रास्ता रहा है। यह पाकिस्तान के उन अवरोधों से बचने का जरिया है, जो भारतीय सामानों को जमीन के रास्ते गुजरने की इजाजत नहीं देते।
10वीं सदी के फारसी विद्वान और लेखक अल-बिरूनी ने चाबहार शहर के पास के तटीय इलाके को—जिसे उस समय ‘तिज’ या ‘तिस’ के नाम से जाना जाता था—अपनी किताब ‘किताब तारीख अल-हिंद’ (भारत का इतिहास) में तटीय भारत का प्रवेश द्वार बताया था।
तेहरान के लिए, यह बंदरगाह दुनिया से फिर से जुड़ने का एक रास्ता है, जो दशकों से पश्चिमी देशों के अलग-थलग किए जाने का जवाब है। फथाली ने इसके क्षेत्रीय महत्व पर जोर देते हुए कहा, ‘हमारा मानना है कि चाबहार मध्य एशिया को खुले समुद्र से जोड़ने वाला एक अहम केंद्र बन सकता है।’
