काठमांडू , डिजिटल डेस्क : ग्लेशियर टूटने के बाद नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बीच अब जिंदगी बचाने की जंग तेज हो गई है। आठ जिलों में राहत और बचाव अभियान चलाया जा रहा है, लेकिन खराब मौसम के कारण इसमें लगातार दिक्कतें आ रही हैं। शनिवार को भी खराब मौसम की वजह से बचाव अभियान को बीच में रोकना पड़ा। आपदा से करीब एक लाख नेपाली नागरिक बेघर हो गए हैं, जबकि तीन करोड़ लोगों के सामने जीवनयापन का संकट खड़ा हो गया है। हालात को देखते हुए नेपाल सरकार ने दुनिया भर से मदद की गुहार लगाई है। रॉयटर के अनुसार, नेपाल के वित्त मंत्री स्वर्णिम वागले ने अनुमान जताया है कि देश को चार से पांच अरब डालर की मदद की जरूरत पड़ेगी। उन्होंने कहा कि हर सांस को बचाने के लिए दुनिया पैसे और तकनीक से मदद करे। भारी मात्रा में बर्फ, चट्टान, कीचड़ और मलबा पहाड़ी नदियों के रास्ते नेपाल की तरफ करीब 200 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बढ़ा गौरतलब है कि बुधवार को नेपाल-तिब्बत सीमा से 20 किलोमीटर ऊपर ग्लेशियर टूट गया था। इसके बाद भारी मात्रा में बर्फ, चट्टान, कीचड़ और मलबा पहाड़ी नदियों के रास्ते नेपाल की तरफ करीब 200 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से बढ़ा। इससे तिब्बत और नेपाल में कुल मिलाकर करीब 3000 लोग लापता हो गए। इसमें नेपाल में 2400 लोग लापता है, जिसमें 320 विदेशी नागरिक भी शामिल हैं। अधिकारियों ने बताया कि 261 विदेशी नागरिकों को बचाया जा चुका है, जिसमें 167 भारतीय हैं। 4400 लोगों को बचाया जा चुका है। अब तक नेपाल में 669 और तिब्बत के इलाके में सात लोगों की मौत की पुष्टि की जा चुकी है। तलाश अभियान में 15000 सुरक्षा कर्मी लगाए गए हैं। तिब्बत आपात प्रबंधन विभाग के अनुसार, ग्यिरोंग काउंटी में 550 लोग लापता हैं, जिनमें 260 विदेशी नागरिक हैं। हालांकि, उनकी राष्ट्रीयता के बारे में जानकारी नहीं दी गई है। इससे पहले चीनी अधिकारियों ने शुक्रवार को कहा था कि ग्यिरोंग काउंटी से 1000 से ज्यादा लोगों को सुरक्षित निकाला जा चुका है। इनमें 555 विदेशी पर्यटक और 499 स्थानीय नागरिक शामिल हैं। चीन ने 2141 बचाव कर्मियों और 86 विशेषज्ञों को तलाश अभियान में लगाया है। भारत ने भेजी 60 टन राहत सामग्री, सुरंग बचाव दल भी पहुंचा भारतीय विदेश मंत्रालय के अनुसार, भारत की ओर से अब तक 60 टन राहत सामग्री लेकर तीन विमान नेपाल पहुंच चुके हैं। इसके अलावा 11 सदस्यीय सुरंग बचाव विशेषज्ञों की एक टीम भी नेपाल पहुंची है। यह टीम रसुवा और नुवाकोट जिलों में हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की सुरंगों में फंसे लोगों को निकालने में मदद कर रही है। टीम ने त्रिशूली इलाके में हवाई सर्वेक्षण किया और चिलीम और लांगतांग इलाके में बचाव अभियान की परिस्थितियों का आकलन किया। इस अभियान में नेपाल सेना और पुलिस के 82 सदस्य भी जुटे हुए हैं। सबसे ज्यादा लोग त्रिशूली-1 और त्रिशूली-3ए हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट से जुड़ी सुरंगों में फंसे हैं। नेपाल सेना अब तक 350 से ज्यादा लोगों को सुरंगों से निकाल चुकी है। माना जा रहा है कि वहां अभी सैकड़ों कर्मचारी फंसे हो सकते हैं। रसुवा में सुरंग में फंसे चार भारतीयों को भी निकाल लिया गया है। भारत ने नेपाल को प्रीफैब्रिकेटेड पुल और कनेक्टिविटी बहाल करने के लिए तकनीकी टीम भेजने का प्रस्ताव भी दिया है। भारत और चीन मिलकर नेपाल में 42 बेली-ब्रिज का निर्माण करेंगे, ताकि परिवहन व्यवस्था को फिर से सुचारू किया जा सके। चीन की तरफ से भी नेपाल के आपदा प्रभावित इलाकों में आपात सहायता और अंतरराष्ट्रीय बचाव सहयोग भेजा गया है। हालांकि, इसके बारे में विस्तार से जानकारी नहीं दी गई है। बारिश ने फिर रोका अभियान, शवों की पहचान बनी चुनौती नेपाल के शीर्ष अधिकारी नरेन्द्र परियार ने रायटर को बताया कि लगातार हो रही बारिश और नदियों में बढ़े जलस्तर की वजह से रसुवा जिले में बचाव अभियान को अस्थायी तौर पर रोकना पड़ा। फिलहाल बचाए गए तीर्थयात्रियों को सड़क मार्ग से काठमांडू लाने पर पूरा ध्यान दिया जा रहा है। चितवन जिला अधिकारियों के मुताबिक, मलबे से बरामद हो रहे शव खराब हालत में हैं और सड़ने भी लगे हैं। ऐसे में उनकी पहचान कर पाना मुश्किल हो रहा है। स्वास्थ्य जोखिम और महामारी के खतरे को देखते हुए शवों के डीएनए सैंपल लिए जा रहे हैं। अन्य औपचारिकताएं पूरी करने के बाद उन्हें दफनाया जा रहा है। काठमांडू में बड़ी संख्या में लोग महाराजगंज मेडिकल कैंपस के आसपास जुटे हैं और लापता स्वजनों की तलाश कर रहे हैं। कुछ शवों को वहां भी लाया गया है। लोग अपने स्वजनों की तस्वीरें दिखाकर उनके बारे में पूछताछ कर रहे हैं और अस्पताल के बाहर लगाई गई मृतकों की तस्वीरों तथा प्राथमिक जानकारियों से उनका मिलान कर रहे हैं। अधिकारियों के अनुसार, अब तक 49 शवों की शिनाख्त की जा चुकी है। झील से पानी निकला, खतरा कुछ कम हुआ ग्लेशियर टूटने के बाद लेंडे खोला और त्रिशूली नदियों के रास्ते में ऊंचाई पर बनी एक झील से पानी रिसने के कारण खतरा कुछ कम हुआ है। चीनी मीडिया सीसीटीवी ने अधिकारियों के हवाले से बताया कि उपग्रह तस्वीरों में झील में पानी घटता हुआ पाया गया है। इसके चलते नीचे की ओर बनी एक अन्य झील में भी कम मात्रा में पानी पहुंच रहा है, जिससे वहां दबाव भी कम हुआ है। हालांकि, नेपाल के अधिकारियों का कहना है कि जब तक झील का पूरा पानी निकल नहीं जाता, फ्लैश फ्लड का खतरा बना रहेगा। इसलिए हालात पर लगातार निगरानी रखी जा रही है। नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने कहा कि राहत और बचाव अभियान में नेपाल को किसी अन्य देश की मदद की जरूरत नहीं है। हालांकि, हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की सुरंगों में फंसे लोगों को निकालने, परिवहन और संचार सेवाएं बहाल करने, नष्ट हुए पुलों के पुनर्निर्माण, मृतकों की पहचान, डीएनए टेस्टिंग और शवों को लंबे समय तक सुरक्षित रखने जैसे कामों में अन्य देशों की मदद की जरूरत है। नेपाल ने त्वरित मदद के लिए भारत का जताया आभार प्रेट्र के अनुसार, भारत की ओर से त्वरित मदद भेजे जाने पर नेपाल के विदेश मंत्री शिशिर खनाल ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का आभार जताया। उन्होंने कहा कि आपदा के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने अत्यधिक उदारता के साथ दिल खोलकर मदद की है। प्रेट्र से बातचीत में उन्होंने कहा कि भारत ने नेपाल के पुनर्निर्माण में भी उदारता से सहयोग करने के संकेत दिए हैं। उन्होंने कहा कि इससे पहले 2015 में आए विनाशकारी भूकंप के दौरान भी उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी का यही मानवीय चेहरा देखा था। उस दौरान भी भारत सरकार ने खुलकर नेपाल की मदद की थी। नेपाल के राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल ने भी मदद के लिए एक्स पर राष्ट्रपति द्रौपदी मूर्मु का आभार जताया। Post navigation GPM की ऐतिहासिक धरोहरों का विशेषज्ञ दल ने पुरातात्विक स्थलों का किया सर्वे 108 भारतीयों का सुरक्षित रेस्क्यू, 275 लापता,भारत ने भेजी फोरेंसिक टीम