काठमांडू, डिजिटल डेस्क : नेपाल में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद बदहाल हुए अस्पतालों की स्थिति और भी बदतर है। यहां सैंकड़ों लोग अपने स्वजनों की खोज-खबर लेने के लिए अलग-अलग अस्पतालों के बाहर घंटों जमा रहे। वह अपने परिवार के सदस्यों और दोस्तों की तलाश में हैं जो अब तक लापता हैं। जबकि खोज अभियान नदी के किनारों और निचले क्षेत्रों में जारी है। काठमांडू पोस्ट समाचार पत्र के अनुसार,जब बाढ़ ने रसुवा और नेपाल के अन्य केंद्रीय हिस्सों को निगल लिया तो महाराजगंज में त्रिभुवन विश्वविद्यालय शिक्षण अस्पताल में सैकड़ों लोग अपने रिश्तेदारों की तलाश में जुटे थे। पवित्र घास ‘कुश’ से बने पुतलों का किया अंतिम संस्कार बाढ़ से प्रभावित नुवाकोट और रसुवा जिलों में लापता लोगों का कोई सुराग न मिलने पर उनके परिवारों ने पवित्र घास ‘कुश’ से बने पुतलों का अंतिम संस्कार करना शुरू कर दिया है। अस्पतालों, मुर्दाघरों और नदी तटों पर दिन-रात की तलाश के बाद जब शव नहीं मिले, तो परिजनों ने अनुष्ठानपूर्वक इन पुतलों को जलाकर अपने प्रियजनों को विदाई दी। त्रिशुली नदी के किनारे परिवार एकत्रित हुए, जहाँ पुजारियों ने कुश से मानव आकृति बनाकर उसे लकड़ी की चिता पर रखा। इसके बाद आम शवयात्रा की तरह ही सभी वैदिक रीति-रिवाज पूरे किए गए, ताकि परिजन अपने शोक को अभिव्यक्त कर सकें। रासुवा में भी कई परिवारों ने निरंतर विफलता के बाद इसी प्रतीकात्मक विधि का सहारा लिया। अपनों की तलाश में भटकते परिजन 26 अगस्त को आई विनाशकारी बाढ़ के एक हफ्ते बाद भी राजधानी काठमांडू का त्रिभुवन अस्पताल त्रासदी की दर्द बयां कर रहा है। अस्पताल परिसर में फैली दुर्गंध और बाहर लटकती तस्वीरें इस भयानक आपदा का जीता जगता सबूत हैं। बाढ़ के कारण अब तक 1,200 से अधिक लोग अपनी जान गंवा चुके हैं, जबकि 4,000 से अधिक लोग अब भी लापता हैं। डॉक्टरों को शवों की पहचान करने में भारी मशक्कत करनी पड़ रही है। शवों का प्रतीकात्मक दाह संस्कार संक्रमण फैलने से रोकने के लिए चितवन और नुवाकोट जैसे जिलों में अज्ञात और पहचाने गए शवों को अस्थायी रूप से दफनाया जा रहा है। चितवन में डीएनए मिलान के बाद शवों को आसानी से निकालने के लिए 1.5 मीटर गहरे गड्ढे खोदे जा रहे हैं। वहीं, हिंदू परंपराओं के बावजूद अपनों के अवशेष न मिलने पर नुवाकोट में त्रिशूली नदी के किनारे पुआल की मूर्तियां बनाकर प्रतीकात्मक दाह संस्कार किया जा रहा है। नेपाल की मुआवजे की मांग नेपाल के विदेश मंत्री शिसिर खनाल ने कहा कि नेपाल उस जलवायु परिवर्तन की भारी कीमत चुका रहा है, जिसे उसने पैदा नहीं किया। नेपाल का उत्सर्जन नगण्य है, जबकि चीन (30%), अमेरिका (13%) और भारत (8%) प्रमुख उत्सर्जक हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि नेपाल ने अंतरराष्ट्रीय साझेदारों को जलवायु क्षतिपूर्ति का औपचारिक दावा भेजा है। यदि हिमालयी ग्लेशियर गायब हुए, तो दक्षिण एशिया के 2 अरब लोगों की जल सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी। नेपाल इस मुद्दे को अंतरराष्ट्रीय मंच पर अधिकार और न्याय के रूप में उठाएगा। परिजन लापता लोगों की तलाश में भटक रहे बीते बुधवार की सुबह जब बाढ़ ने रसुवा और नेपाल के अन्य केंद्रीय हिस्सों को प्रभावित किया और त्रिशुली और नारायणी नदी प्रणालियों के साथ नीचे की ओर बढ़ गई, यह सभी तब से उनके संपर्क में नहीं थे। कई परिवारों के सदस्य अपने प्रियजनों की तस्वीरें बोर्ड पर प्रदर्शित कर रहे थे, जिसमें उनके पते और मोबाइल नंबर भी थे, और लोगों से अनुरोध कर रहे थे कि वे उन्हें खोजने में मदद करें। प्रशासन त्रिशुली और नारायणी नदियों से निकाले गए शवों की बढ़ती संख्या से निपट रहा था। भैरवपुर अस्पताल में शवगृह में जगह खत्म होने की सूचना मिली थी। Post navigation PAK: प्रसिद्ध बलूच लोक गायिका माई सुभाई बुगती की गोली मारकर हत्या बांग्ला फिल्म के अभिनेता उत्तम कुमार जन्मशती पर निकली भव्य पदयात्रा