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रियाद, डिजिटल डेस्क : सऊदी अरब के दक्षिणी हिस्सों पर हूती विद्रोहियों के लगातार मिसाइल और ड्रोन हमले हो रहे हैं। इस गंभीर संकट के बीच अब एक बड़ा सवाल हर किसी के जेहन में उठ रहा है कि सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच मक्का संधि के बावजूद, आखिर इस पूरे मामले में पाकिस्तान कहां है?

इस्लामाबाद और रियाद के बीच ऐतिहासिक रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर हुए एक महीने से भी ज्यादा का समय बीत चुका है। लेकिन इसके बावजूद, सऊदी की सुरक्षा को लेकर पाकिस्तान ने जो बड़ी-बड़ी वादे की थीं, वे अब तक सिर्फ कागजों तक ही सीमित नजर आ रही हैं। धरातल पर उसकी तरफ से कोई ठोस कदम उठता नहीं दिख रहा है।

नाटो की तर्ज पर बनी सामूहिक ढाल

7 अगस्त को सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, तुर्किये के राष्ट्रपति रेसेप तैयप एर्दोगन और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते (MJDA) पर हस्ताक्षर किए थे।

इस समझौते में स्पष्ट रूप से कहा गया था कि तीनों देशों में से किसी भी एक पर सशस्त्र हमला सभी पर हमला माना जाएगा। नाटो की धारा-5 जैसी सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था के रूप में प्रस्तुत किए गए इस समझौते का उद्देश्य तीनों देशों के बीच एक मजबूत रक्षात्मक समन्वय और निवारक तंत्र तैयार करना था।

समझौते के कुछ ही हफ्तों बाद ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के आभा, खमीस मुशैत, जीजान, नजरान और ताइफ जैसे शहरों पर मिसाइल और ड्रोन हमले तेज कर दिए।

यहां तक कि पवित्र शहर मक्का के पास भी एक ड्रोन को इंटरसेप्ट किया गया। इन हमलों में दर्जनों नागरिक घायल हुए और तेल प्रतिष्ठानों में आग लग गई।

हूतियों ने सऊदी राजधानी रियाद पर भी विफल हमले किए हैं। इन सबके बावजूद, जमीनी स्तर पर पाकिस्तान की ओर से पूरी तरह चुप्पी छाई हुई है, और न ही उस सामूहिक प्रतिक्रिया खंड को औपचारिक रूप से लागू किया गया है जिसे इस्लामाबाद ने खुद बातचीत कर तैयार किया था।

सऊदी में तैनात पाकिस्तानी सैनिक और जेट का कोई इस्तेमाल नहीं ?

सऊदी अरब द्वारा 11 अप्रैल, 2026 को जारी एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, दोनों देशों के बीच हुए रणनीतिक पारस्परिक रक्षा समझौते के तहत फारस की खाड़ी के पास स्थित किंग अब्दुलअजीज एयरबेस पर पाकिस्तानी वायुसेना के लड़ाकू विमान और सहायक विमान पहले से तैनात हैं।

पाकिस्तानी मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इस तैनाती में ब्रिगेड स्तर के लगभग 8,000 सैनिक, पाकिस्तान में असेंबल किए गए JF-17 थंडर लड़ाकू विमानों का एक स्क्वाड्रन, दो सैन्य ड्रोन स्क्वाड्रन और चीनी मूल की HQ-9 लंबी दूरी की वायु रक्षा प्रणाली शामिल है।

इन सभी हथियारों और उपकरणों का संचालन पूरी तरह से पाकिस्तानी कर्मियों द्वारा किया जाता है, जबकि तैनाती, रसद और प्रति-सैनिक मुआवजे सहित पूरा खर्च सऊदी अरब उठाता है।

सऊदी जमीन पर मिसाइलें बरसने और मक्का पर अलर्ट जारी होने के बावजूद, सऊदी अरब द्वारा वित्तपोषित इस सैन्य टुकड़ी को सक्रिय नहीं किया गया है।

बहुपक्षीय गठबंधनों में भी कोई जमीनी हलचल नहीं

अन्य सऊदी-नेतृत्व वाले सुरक्षा गठबंधनों में पाकिस्तान की प्रमुख भूमिका को देखते हुए यह निष्क्रियता और अधिक स्पष्ट हो जाती है।

इस्लामिक सैन्य आतंकवाद-रोधी गठबंधन (IMCTC): 43 देशों के इस गठबंधन की कमान 2017 से पाकिस्तान के पूर्व सेना प्रमुख जनरल राहील शरीफ संभाल रहे हैं। सऊदी अरब द्वारा हूतियों को आतंकवादी संगठन घोषित किए जाने के बावजूद, इस गठबंधन को मोर्चे पर सक्रिय नहीं किया गया।

बहुराष्ट्रीय समुद्री रक्षा गठबंधन: लाल सागर और बाब अल-मंदेब में शिपिंग सुरक्षा के लिए बने इस नए गठबंधन में पाकिस्तान के पास डिप्टी कमांड की जिम्मेदारी है, लेकिन यहाँ भी कोई ठोस अभियान देखने को नहीं मिला है।

बैठकों और बयानों तक सीमित रणनीति ?

25 सितंबर को रियाद में तुर्किये और पाकिस्तान के सेना प्रमुखों ने मक्का समझौते के तहत सऊदी अरब को समर्थन देने पर चर्चा की। दोनों देशों के प्रमुख सैन्य और खुफिया सहयोग को गहरा करने तथा रक्षा क्षमताओं के एकीकरण पर सहमत हुए।

बयान में सऊदी अरब की सुरक्षा, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के प्रति सामूहिक प्रतिबद्धता दोहराई गई, लेकिन इसमें कोई स्पष्ट समयसीमा या ठोस रक्षात्मक कदम शामिल नहीं थे।

विडंबना रही कि दोनों सेना प्रमुखों की सऊदी अरब में मौजूदगी के चंद घंटों बाद ही हूतियों ने खमीस मुशैत की ओर मिसाइलें दाग दीं, जिन्हें सऊदी एयर डिफेंस ने नष्ट किया।