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 नई दिल्ली ,डिजिटल डेस्क : विश्व में बढ़ती राजनीतिक और आर्थिक अनिश्चितता के बीच यूरोपीय देश अपने सोने के भंडार को सुरक्षित ठिकानों के करीब लाने में जुटे हैं। अमेरिका और कनाडा में रखा करीब 313 टन सोना लंदन स्थानांतरित किया जा चुका है। नीदरलैंड भी बड़ी मात्रा में अपना सोना उत्तरी अमेरिका से वापस ला चुका है।

विशेषज्ञ इसे किसी संभावित आर्थिक या भू-राजनीतिक संकट की तैयारी के तौर पर देख रहे हैं।बीबीसी के अनुसार, नीदरलैंड के इस कदम ने खास तौर पर ध्यान खींचा है। माना जा रहा है कि डच केंद्रीय बैंक और अर्थशास्त्री संकट की स्थिति में सोने को तुरंत इस्तेमाल करने की क्षमता अपने हाथ में रखना चाहते हैं। सोने को लंबे समय से ऐसे समय में सुरक्षित संपत्ति माना जाता है, जब वित्तीय बाजारों और मुद्राओं पर भरोसा कमजोर पड़ता है।

जर्मनी और फ्रांस भी कर चुके हैं पहल

यूरोप के दूसरे देश भी पहले इसी तरह के कदम उठा चुके हैं। फ्रांस ने अमेरिका में रखा अपना स्वर्ण भंडार वापस मंगाने की घोषणा की थी। वहीं, जर्मनी के बुंडेसबैंक ने 2016 तक विदेश में रखा 216 टन से अधिक सोना वापस जर्मनी मंगा लिया था।

इसमें न्यूयार्क से करीब 111 टन और पेरिस से करीब 105 टन सोना शामिल था। विशेषज्ञों के मुताबिक, वैश्विक अस्थिरता के दौर में केंद्रीय बैंकों के लिए सोने की भौगोलिक स्थिति भी महत्वपूर्ण हो जाती है।

न्यूयॉर्क में क्यों रखा था यूरोपीय देशों ने सोना

शीत युद्ध के दौरान कई यूरोपीय देशों ने अपना सोना न्यूयार्क में इसलिए रखा था ताकि जरूरत पड़ने पर वह सुरक्षित रहे। अब युद्ध, व्यापार तनाव, महंगाई और ब्याज दरों को लेकर बढ़ती अनिश्चितता के बीच कुछ देश फिर से अपने भंडार की स्थिति पर विचार कर रहे हैं।

नीदरलैंड ने लंदन को चुना सुरक्षित ठिकाना

डी नीदरलैंडेश बैंक के मुताबिक, अमेरिका और कनाडा से मार्च से अगस्त के बीच वापस लाया गया सोना बैंक आफ इंग्लैंड की तिजोरी में रखा जाएगा। लंदन को सोने के कारोबार का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

संकट के समय यहां सोने की खरीद-फरोख्त अपेक्षाकृत आसानी से की जा सकती है। बैंक आफ इंग्लैंड दुनिया के सबसे बड़े स्वर्ण भंडारों के संरक्षकों में से एक है। मध्य लंदन स्थित करीब 300 साल पुराने इस बैंक की तिजोरियों में लगभग चार लाख सोने की ईंटें रखी होने का अनुमान है, जिनकी कीमत 200 अरब पाउंड से अधिक बताई जाती है।

पिछले चार वर्षों में दुनिया भर के केंद्रीय बैंकों ने औसतन हर साल करीब 1,000 टन सोना खरीदा है। विश्व स्वर्ण परिषद के अनुसार, यह पिछले दस वर्षों के औसत से करीब 500 टन अधिक है। इससे संकेत मिलता है कि केंद्रीय बैंक विदेशी मुद्रा भंडार में सोने की भूमिका को पहले से अधिक महत्व दे रहे हैं।

इन्वेस्टमेंट बैंक चार्ल्स श्वाब के मुताबिक, पिछले 50 वर्षों में सोने की कीमतों में बढ़ोतरी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआइ) की तुलना में अधिक रही है। वहीं, गोल्डमैन के शोधकर्ताओं ने 2026 के अंत तक सोने की कीमत करीब 4,900 डालर प्रति ट्राय औंस तक पहुंचने का अनुमान जताया है।