वाशिंगटन, डिजिटल डेस्क : अमेरिकी न्यायपालिका ने ट्रंप प्रशासन को एक बड़ा झटका देते हुए एच-1बी वीजा पर लगाए गए एक लाख डॉलर (लगभग 80 लाख रुपये से अधिक) के भारी-भरकम शुल्क को बहाल करने से साफ इनकार कर दिया है। बोस्टन स्थित फर्स्ट सर्किट कोर्ट ऑफ अपील्स के तीन न्यायाधीशों की पीठ ने अपने एक महत्वपूर्ण फैसले में ट्रायल कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगाने से मना कर दिया, जिसमें इस भारी फीस को संसद की अनुमति के बिना लगाया गया ‘अवैध कर’ करार दिया गया था। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से रेखांकित किया कि राष्ट्रपति प्रशासन यह साबित करने में पूरी तरह विफल रहा कि कांग्रेस ने उन्हें इतना भारी वित्तीय बोझ थोपने का स्पष्ट अधिकार दिया था। न्यायाधीशों ने डेमोक्रेटिक पार्टी शासित 20 राज्यों द्वारा दायर उस याचिका को सही ठहराया न्यायाधीशों ने डेमोक्रेटिक पार्टी शासित 20 राज्यों द्वारा दायर उस याचिका को सही ठहराया, जिसमें तर्क दिया गया था कि इस तरह का एकतरफा और भारी शुल्क कानूनन असंवैधानिक है। यह एच-1बी वीजा मुख्य रूप से उन उच्च-कुशल विदेशी पेशेवरों के लिए एक वरदान साबित होता है, जो भारत और चीन जैसे देशों से हर साल अमेरिका की बड़ी तकनीकी कंपनियों में सेवाएं देने पहुंचते हैं। सामान्य तौर पर इस वीजा की प्रक्रिया के लिए कंपनियों को दो हजार से पांच हजार डॉलर के बीच शुल्क चुकाना पड़ता था, लेकिन ट्रंप प्रशासन ने पिछले साल सितंबर में एक उद्घोषणा के जरिये इसे बढ़ाकर सीधे एक लाख डॉलर कर दिया था। अदालत के इस मानवीय और न्यायसंगत रुख से न सिर्फ उन लाखों युवा प्रवासियों और छात्रों में एक नई उम्मीद जगी है, बल्कि अमेरिकी टेक सेक्टर ने भी राहत की सांस ली है। इस फैसले से यह एक बार फिर साबित हुआ है कि लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में कार्यपालिका के हर फैसले को संविधान और संसद के दायरे में ही रहना होगा। H-1B वीजा पर तीन साल की रोक लगाने की मांग रिपब्लिकन सीनेटर टिम शीही ने अमेरिकी श्रमिकों के हितों की रक्षा और शासन-प्रशासन की कमियों को दूर करने के लिए सीनेट में ‘एंड एच-1बी एब्यूज एक्ट’ पेश किया है। इस नए विधेयक में नए एच-1बी वीजा जारी करने पर तीन साल की रोक लगाने और डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन द्वारा लाई गई एक लाख डॉलर की भारी-भरकम फीस को कानूनी रूप से लागू करने की मांग की गई है, जिसे पहले एक संघीय अदालत ने रद कर दिया था। सीनेटर शीही का तर्क है कि इस कार्यक्रम का उद्देश्य अमेरिकी श्रमिकों के अधिकारों की अनदेखी करना नहीं, बल्कि विशेष कौशलों की कमी को पूरा करना है। इस कदम से भारत और चीन जैसे देशों से उच्च कुशल श्रमिकों को नियुक्त करने वाली अमेरिकी कंपनियों और लाखों पेशेवरों पर गहरा असर पड़ सकता है। इस विधेयक का समर्थन इमीग्रेशन अकाउंटेबिलिटी प्रोजेक्ट और फेडरेशन फार अमेरिकन इमीग्रेशन रिफार्म (फेयर) जैसी संस्थाएं कर रही हैं। Post navigation राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु यूरोप के तीन देशों की ऐतिहासिक यात्रा संपन्न, स्वदेश रवाना CGPSC भर्ती घोटाले में ईडी ने पूर्व चेयरमैन को किया गिरफ्तार, हो सकता है बड़ा खुलासा