काबुल, डिजिटल डेस्क :अफगानिस्तान में तालिबान सरकार द्वारा हाल ही में लागू की गई नई दंड संहिता ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गहरी चिंता पैदा कर दी है। तालिबान के सर्वोच्च नेता हिबतुल्ला अखुंदजादा की मंजूरी से पारित इस कानून में महिलाओं, विवाह और पारिवारिक जीवन से जुड़े कई ऐसे प्रावधान हैं, जिनकी मानवाधिकार संगठन कड़ी आलोचना कर रहे हैं। यह कानून कुछ महीने पहले ही लागू की गई थी। एक तरफ जहां पूरी दुनिया महिला सशक्तिकरण और समानता की दिशा में आगे बढ़ रही है, वहीं अफगानिस्तान में महिलाओं को उनके बुनियादी अधिकारों से तेजी से वंचित किया जा रहा है। आइए जानते हैं इस नए कानून के प्रमुख और विवादास्पद बिंदु क्या हैं। चुप्पी का मतलब माना जाएगा सहमति नए कानून के तहत सबसे ज्यादा आलोचना उस प्रावधान की हो रही है जिसमें कहा गया है कि यदि कोई बालिग वर्जिन लड़की शादी के प्रस्ताव पर खामोश रहती है, तो उसकी इस चुप्पी को ही उसकी रजामंदी मान लिया जाएगा। मानवाधिकार कार्यकर्ताओं का कड़ा विरोध है कि शादी जैसे जीवन भर के फैसले में स्पष्ट और स्वतंत्र सहमति आवश्यक है। महज खामोशी को स्वीकृति मान लेने से जबरन विवाह को सीधे तौर पर बढ़ावा मिलेगा। बाल विवाह को समर्थन और तलाक में अड़चनें तालिबान के फरमान के अनुसार, किसी भी नाबालिग लड़की का निकाह तय करने का अधिकार उसके पिता या दादा को सौंप दिया गया है। इससे बाल विवाह के मामलों में भारी इजाफा होने की आशंका जताई जा रही है। यदि कोई महिला अपनी शादी खत्म करना चाहती है, तो उसे अब अनिवार्य रूप से अदालत की मंजूरी लेनी होगी। इससे महिलाओं के लिए शोषणकारी या हिंसक रिश्तों से बाहर निकलना लगभग असंभव हो जाएगा। घरेलू हिंसा पर असंवेदनशील नियम नई संहिता में घरेलू हिंसा को लेकर जो नियम बनाए गए हैं, वे बेहद चौंकाने वाले हैं। यदि कोई पति अपनी पत्नी या बच्चों के साथ मारपीट करता है, तो उस पर तभी कानूनी कार्रवाई होगी जब शरीर की कोई हड्डी टूटे या गंभीर खुले घाव दिखाई दें। इसका सीधा अर्थ यह है कि आम मारपीट, शारीरिक शोषण या मानसिक प्रताड़ना को अपराध नहीं माना जाएगा। महिला अधिकार संगठनों का स्पष्ट कहना है कि हिंसा केवल दिखाई देने वाली चोटों तक सीमित नहीं होती, बल्कि मानसिक आघात भी उतना ही खतरनाक है। शिक्षा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर प्रहार महिलाओं की आज़ादी को कुचलने के लिए तालिबान ने कुछ और कड़े फरमान जारी किए हैं। नए कानून के मुताबिक, अगर कोई विवाहित महिला अपने पति की अनुमति के बिना अपने ही रिश्तेदारों से मिलने जाती है, तो उसे सज़ा का सामना करना पड़ सकता है। तालिबान ने पहले ही 12 वर्ष से अधिक उम्र की लड़कियों की स्कूली शिक्षा और महिलाओं के विश्वविद्यालय जाने पर पूरी तरह से रोक लगा रखी है, जिससे लाखों लड़कियों के डॉक्टर या इंजीनियर बनने के सपने टूट गए हैं। वैश्विक प्रतिक्रिया और आगे का रास्ता इन क्रूर फैसलों को लेकर सोशल मीडिया से लेकर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक भारी आक्रोश देखने को मिल रहा है। लोगों का कहना है कि समाज में जब भी कट्टरपंथी सोच हावी होती है, तो उसका सबसे पहला और सबसे गहरा प्रहार महिलाओं की स्वतंत्रता पर होता है। 1990 के दशक की तरह ही तालिबान एक बार फिर महिलाओं को सार्वजनिक जीवन से पूरी तरह मिटाने की दिशा में काम कर रहा है। दुनिया भर के विशेषज्ञों और संस्थाओं की यह साझा चिंता है कि जिस देश में महिलाओं की शिक्षा और अधिकारों को कुचला जाएगा, उस समाज और देश का भविष्य कभी उज्ज्वल नहीं हो सकता। Post navigation बरेली होकर चलेंगी दो नई ट्रेनें, पीलीभीत-टनकपुर पैसेंजर को शाहजहांपुर तक विस्तार विदेश मंत्री जयशंकर ने बहरीन के राजा के साथ द्विपक्षीय संबंधों पर की चर्चा