19 वर्ष के अथर्व ने खुद की सुप्रीम कोर्ट में पैरवी, 10 मिनट की बहस में जीता केस

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नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क : 19 साल के अथर्व ने खुद की सुप्रीम कोर्ट में पैरवी, 10 मिनट की बहस में जीता केसछात्र ने अपने मामले की पैरवी स्वयं करने की गुहार पीठ से लगाई। इस पर चीफ जस्टिस ने जबलपुर के नीट क्वालिफाइड छात्र अथर्व चतुर्वेदी को सुनवाई का अवसर दे दिया। करीब 10 मिनट तक उसकी बात सुनने के बाद सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने तत्काल ऐसा फैसला सुना दिया, जिसे ऐतिहासिक माना जा रहा है।

संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का प्रयोग करते हुए शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग और मध्य प्रदेश सरकार को निर्देश जारी किया कि आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (ईडब्ल्यूएस) के नीट योग्य अभ्यर्थी को एमबीबीएस पाठ्यक्रम में प्राविजनल प्रवेश दिया जाए।

सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने दिया अंतरिम राहत का आदेश

अंतरिम राहत प्रदान करते हुए अदालत ने निर्देश दिया कि याचिकाकर्ता को सत्र 2025-26 में उसकी ईडब्ल्यूएस रैंक के अनुसार एमबीबीएस में अस्थायी प्रवेश दिया जाए, बशर्ते वह निर्धारित शुल्क व अन्य औपचारिकताएं पूरी करे।

यह आदेश चीफ जस्टिस सूर्य कांत, जस्टिस जायमाल्या बागची और जस्टिस एनवी अंजारिया की पीठ ने पारित किया। अदालत ने माना कि याचिकाकर्ता अथर्व चतुर्वेदी ने नीट परीक्षा दो बार उत्तीर्ण की, लेकिन विभिन्न कारणों से उसे प्रवेश नहीं मिल सका।

सीजेआई की सख्त टिप्पणी

सुनवाई के दौरान राज्य की ओर से कहा गया कि निजी मेडिकल कॉलेजों में आरक्षण नीति को लेकर विचार-विमर्श जारी है। इस पर मुख्य न्यायाधीश ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यदि निजी कॉलेज आरक्षण नीति का पालन नहीं करते, तो उन्हें बंद कर देना चाहिए। आरक्षण नीति की अनदेखी किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि नीतिगत प्रक्रियाओं या प्रशासनिक देरी के कारण किसी छात्र का भविष्य प्रभावित नहीं होना चाहिए।

राज्य का पक्ष, अदालत असंतुष्ट

राज्य सरकार की ओर से यह दलील भी दी गई कि याचिकाकर्ता काउंसलिंग प्रक्रिया की शर्तों को जानते हुए शामिल हुआ था, इसलिए अब उसे चुनौती नहीं दे सकता। हालांकि अदालत इस तर्क से संतुष्ट नहीं हुई।

दरअसल, याचिकाकर्ता ने पूर्व में हाई कोर्ट में दो जुलाई, 2024 की राजपत्र अधिसूचना को संविधान के अनुच्छेद 14 और 15(6) का उल्लंघन बताते हुए चुनौती दी थी और बढ़ी हुई ईडब्ल्यूएस सीटों पर प्रवेश की मांग की थी। अथर्व चतुर्वेदी ने बताया कि फिलहाल राज्य सरकार द्वारा निजी मेडिकल कॉलेजों में ईडब्ल्यूएस छात्रों के प्रवेश को लेकर स्पष्ट नीति निर्धारित नहीं है।

साथ ही, ईडब्ल्यूएस विद्यार्थियों की पढ़ाई के लिए सरकार जो फीस वहन करती है, वह भी निजी कॉलेजों के संदर्भ में तय नहीं की गई है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश तो मिल गया है, लेकिन जमीनी स्तर पर अभी कई प्रक्रियाएं पूरी होना बाकी हैं।

पिता ने बताई पूरी तैयारी की कहानी

अथर्व के पिता मनोज चतुर्वेदी ने बताया कि पिटीशन तैयार करने से लेकर , डायग्राम और ग्राफ तैयार करने तक का पूरा काम अथर्व ने खुद किया। जब यह पिटीशन सुप्रीम कोर्ट के समक्ष रखी गई तो चीफ जस्टिस को पूरा मामला समझने में देर नहीं लगी।

उन्होंने बताया कि जबलपुर से दिल्ली जाकर स्वयं पैरवी करने में यात्रा और ठहरने सहित लगभग 3 से 4 हजार रुपये का खर्च आ रहा था। ऐसे में अथर्व ने निर्णय लिया कि वह ऑनलाइन ही अपनी पैरवी करेगा। ऑनलाइन सुनवाई के माध्यम से ही उसने स्वयं बहस की और उसी का परिणाम है कि आज यह महत्वपूर्ण आदेश सामने आया है।

अंतरिम आदेश से खुला प्रवेश का रास्ता

शीर्ष अदालत के ताजा आदेश के बाद छात्र को फिलहाल एमबीबीएस में प्रोविजनल एडमिशन का मार्ग मिल गया है। अंतिम निर्णय आगे की सुनवाई और नीतिगत स्थिति पर निर्भर करेगा, लेकिन अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि एक योग्य छात्र का करियर प्रक्रियागत कारणों से प्रभावित नहीं होने दिया जाएगा।

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