नई दिल्ली, एंटरटेनमेंट डेस्क : बॉलीवुड की चकाचौंध भरी दुनिया में ऐसे कई सितारे आए, जिनकी चमक से पूरी दुनिया रोशन थी, लेकिन उनकी अपनी जिंदगी के अंधेरे कभी खत्म नहीं हुए। शोहरत ने कदम चूमे, दुनिया ने पलकों पर बिठाया, लेकिन जब बात अपनों की आई, तो तकदीर ने ऐसी करवट ली कि सब कुछ बिखर गया।
आज हम आपको सिनेमा जगत की एक ऐसी ही दिग्गज अदाकारा की कहानी बताने जा रहे हैं, जिनके लिए ‘किस्मत’ शब्द एक कड़वी हकीकत बनकर रह गया। उन्होंने परदे पर तो हर रिश्ता बखूबी निभाया, मगर असल जिंदगी में उन्हीं के खून के रिश्तों ने उन्हें धोखे और बेबसी की दहलीज पर ला खड़ा किया। कामयाबी के शिखर पर बैठकर भी वह अपनों के दिए जख्मों से ताउम्र लड़ती रहीं। आइए जानते हैं उन्हीं की दर्दनाक दास्तां…
मंदिर में हुआ था ललिता का जन्म
नासिक, महाराष्ट्र के एक छोटे से गांव में साल 1916 का वो दौर था, जब अंबिका (ललिता पवार का बचपन का नाम) का जन्म हुआ। उनकी पैदाइश की कहानी भी किसी फिल्मी सीन से कम नहीं है। उनकी मां मंदिर के दर्शन के लिए निकली थीं कि अचानक मंदिर की चौखट पर ही उन्हें प्रसव पीड़ा हुई और वहीं ललिता का जन्म हुआ। अब जन्म ‘अंबे मां’ के दर पर हुआ था, इसलिए परिवारवालों को कोई और नहीं सूझा तो उन्होंने उनका नाम अंबिका रखा दिया।
कम उम्र में कैमरे के सामने दिखाई कला
अंबिका यानि ललिता अब धीरे-धीरे बड़ी हो रही थीं। जब वो 9 साल की थीं तो उन्हें उम्र के इसी पड़ाव पर सिनेमा में काम करने का मौका मिल गया। साल 1928 में राजा हरिशचंद्र नाम की फिल्म से उन्होंने अपने करियर की शुरूआत की। इसके बाद हिम्मत-ए-मर्दां’ (1935) जैसी फिल्मों में दिखीं। 40 के दशक में वो कई साइलेंट फिल्मों में नजर आईं। कभी एक्शन फिल्मों में काम किया तो कभी वो मायथोलॉजिकल फिल्मों में भी दिखीं।
एक हादसे ने बदली ललिता की जिंदगी
हिंदी फिल्मों में आने के बाद ललिता ने पहले तो कई साइलेंट फिल्मों में काम किया। इसके बाद वो धीरे-धीरे और फिल्मों में दिखने लगीं। इसी बीच एक हादसे ने सबकुछ बदलकर रख दिया। दरअसल साल 1942 में चंद्र राव की फिल्म ‘जंग-ए-आजादी’ में काम करने का मौका मिला।
इस फिल्म की शूटिंग के दौरान ललिता के को-स्टार भगवान दादा को उन्हें एक थप्पड़ मारना था। सारी तैयारी के बाद जैसे ही एक्शन बोला गया तो भगवान दादा ने ललिता को इतनी जोर से थप्पड़ मारा कि ललिता मौके पर ही बेहोश हो गईं। पहले तो लोगों को लगा की ललिता बेहोशी का नाटक कर रही हैं, क्योंकि सीन में हैं लेकिन बाद में जब वो नहीं उठीं तो देखा कि उनके कान से खून आने लगा। इसके तुरंत बाद उन्हें अस्पताल ले जाया गया।
इलाज के दौरान डॉक्टर्स की गलती के चलते ललिता के दाहिने शरीर में लकवा मार गया। इसके बाद उनकी आंख खराब हो गई। इसके बाद उनके हाथ से कई फिल्में चली गईं।
सिनेमा की विलेन बनी ललिता
इस हादसे ने सबकुछ बदल दिया। लेकिन ललिता ने हार नहीं मानी और कुछ सालों के बाद वो वापस से कमबैक करने आईं और 1948 में एक बंद आंख के साथ उन्होंने फिल्म गृहस्थी से कमबैक किया। वो हीरोइन के रोल से हटकर अब विलेन के रोल करने लगीं। कठोर सास बनतीं तो कभी धांसू विलेन बनकर पर्दे पर आतीं।
उनका ये अंदाज भी दर्शकों को भा गया और उन्हें कई फिल्में मिलने लगीं। उनके नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में भी नाम दर्ज है। उनके नाम ‘सबसे लंबे समय तक काम करने वाली अभिनेत्री’ का रिकॉर्ड है। उन्होंने 7 दशक तक काम किया और 700 फिल्मों में भी काम किया। श्री 420′, ‘अनाड़ी’, ‘प्रोफेसर’, ‘दो रास्ते’, और ‘आनंद’ समेत कई हिट फिल्मों में वो नजर आईं।
रामायण की मंथरा बन जीता दर्शकों का दिल
रामानंद सागर की रामायण में कई किरदार नजर आए और उन किरदारों ने दर्शकों के दिलों पर राज किया और इन्हीं में से एक किरदार था मंथरा का।
इस किरदार को किसी और ने नहीं बल्कि ललिता पवार ने ही निभाया था। जब उन्हें ये किरदार मिला तो वो इससे पहेल ही करीब 60 साल से ज्यादा तक सिनेमा में काम कर चुकी थीं। उम्र के इस पड़ाव पर भी ललिता का ये किरदार भी अमर हो गया। हर तरफ उन्हें मंथरा के नाम से जाना जाने लगा।
बहन ही बन बैठी ललिता की सौतन
प्रोफेशनल करियर में ललिता ने जितने उतार-चढ़ाव देखे, तो वहीं निजी जिंदगी में भी ललिता का जीवन मुश्किलों भरा रहा। ललिता ने प्रोड्यूसर गणपतराव पवार से शादी की थी। हालांकि इस शादी में मुश्किल तब आई जब ललिता को पता चला कि उनके पति का अफेयर उनकी ही छोटी बहन से चल रहा था।
ललिता इससे बुरी तरह से टूट गईं और फिर उन्होंने गणपतराव को छोड़कर फिल्म प्रोडयूसर राजप्रकाश गुप्ता से शादी कर ली और इनसे उन्हें एक बेटा भी हुआ।
घर में सड़ती रही थी लाश
700 से ज्यादा फिल्मों में अपनी अदाकारी का लोहा मनवाने वाली ललिता पवार (Lalita Pawar) की निजी जिंदगी का अंत बेहद दर्दनाक रहा। दूसरी शादी के बाद उनके यहाँ एक बेटा हुआ, लेकिन धीरे-धीरे उनकी जिंदगी घर की चहारदीवारी में सिमट कर रह गई। पुणे स्थित अपने बंगले ‘आरोही’ में उन्होंने अंतिम सांस ली। साल 1998 में जब इस दुनिया से उनकी विदाई हुई, तब उस बंगले में उनके पास कोई मौजूद नहीं था।
उनके पति उस दौरान अस्पताल में भर्ती थे और बेटा अपने परिवार के साथ मुंबई में था। नियति का क्रूर मजाक देखिए कि निधन के बाद तीन दिनों तक उनकी लाश उसी घर में सड़ती रही। इस बात का पता तब चला जब उनके बेटे ने फोन किया और कोई जवाब नहीं मिला। अंततः पुलिस ने आकर घर का दरवाजा तोड़ा, तब जाकर ललिता पवार का शव बरामद हुआ।
ये बड़े अफसोस की बात है जो सितारे सिनेमा पर चमकते हैं कि असल में उनकी जिंदगी में खूब अंधेरा ही रहता है। गाना गाया, फिल्मों में एक्शन किया, खूब दर्द झेला, कामयाबी भी खूब पाई, लेकिन जिंदगी का अंतिम पन्ना कोरा ही रह गया, आखिर में अनगिनत यादें देकर चली गईं ललिता पवार।
