नई दिल्ली, न्यूज़ डेस्क : कहते हैं एक सपने के मर जाने से इंसान मरा नहीं करते। गलतियों और हार से सबक लेकर वह उठ खड़े होते हैं। कानपुर से निकलकर बालीवुड में नई पहचान गढ़ रहे वायस आर्टिस्ट व एक्टर विजय विक्रम सिंह (Vijay Vikram Singh) की जीवन यात्रा भी ऐसी ही है। ‘बिग बास चाहते हैं…’ इस दमदार और रौबीली आवाज के पीछे विजय का ही चेहरा है। विजय विक्रम सिंह बताते हैं , ‘बचपन में ही मैंने फौजी बनने का सपना बुन लिया था। दादा जी तो मुझे ब्रिगेडियर वीर विक्रम बहादुर सिंह राजपूत कहकर बुलाते थे। ग्रेजुएशन के बाद आठ बार एसएसबी की परीक्षा दी और हर बार रिजेक्शन ही मिला। इस फेलियर को मैं बर्दाश्त नहीं कर पाया और पूरी तरह शराब में डूब गया। हालांकि, मेरी पढ़ाई जारी रही।
विक्रम को थी शराब की लत
बीएचयू से एमबीए करने के बाद मध्य प्रदेश के सतना में मेरी एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी लग गई। एक सुबह सोकर उठा तो पेट में भयानक दर्द हो रहा था। डाक्टरों ने पीजीआई, लखनऊ रेफर कर दिया। डाक्टर ने मां को बताया कि शराब की वजह से लिवर लगभग खत्म हो चुका है। जिंदा बचने की सिर्फ 10 प्रतिशत उम्मीद है। 35 दिनों तक अस्पताल में भर्ती रहा। एक महीने बाद खिड़की से सूरज की रोशनी देखी तो चेतना का पुनर्जागरण हुआ। एक वह दिन था जब मैं शराब में डूबा रहता था और एक ये दिन है कि मैंने शराब को हाथ तक नहीं लगाया।’
बिग बॉस के लिए छोड़ी सरकारी नौकरी ?
विजय आगे कहते हैं,‘अस्पताल से लौटने के बाद कोलकाता में एमएसटीसी में सरकारी नौकरी लग गई। वहां से ट्रांसफर होकर मुंबई पहुंच गए। एक पार्टी में एक दोस्त की मित्र ने कहा कि आपकी आवाज बहुत दमदार है। इसके साथ कुछ प्रयोग कीजिए। अगले दिन वह मुझे स्टूडियो ले गई। पहली बार मैंने हेडफोन लगाकर आवाज रिकार्ड की। 29 साल की उम्र में अपनी आवाज पर काम शुरू किया।
साल 2010 में बिग बॉस से जुड़े हैं
ट्रेनिंग ली। नौकरी के साथ-साथ रिकार्डिंग भी करने लगा। फिर सरकारी नौकरी छोड़ दी और एक एफएम चैनल में नौकरी करने लगा। एक दिन ‘डांस इंडिया डांस’ में नैरेटर के तौर पर मुझे बुलाया गया। यहां से मेरी आवाज को पहचान मिलनी शुरू हुई। दो साल बाद मीडिया कंपनी एंडेमाल से वायस नैरेशन के लिए फोन आया और दो अक्टूबर, 2010 को मैं ‘बिग बास’ से जुड़ा। तब से अब तक ‘बिग बॉस’ के पीछे मेरी ही आवाज बनी हुई है।