नई दिल्ली, संवाददाता : harish rana euthanasia : इस संसार में कुछ तय है तो बस मृत्यु…निश्चित है..आनी ही है। फिर भी सभी को इच्छा सदैव जीवन की ही रहती है। अनेकानेक कारणों से आत्महत्या जैसे अवसादपूर्ण रास्ते को अपवाद मान लें तो मृत्यु की इच्छा कोई नहीं करता।
सिहर उठेंगे आप कल्पना करके जब पता लगे कि कोई मृत्यु की इच्छा कर रहा है। वो भी अपने प्रिय स्वजन के लिए…बेटे के लिए…भाई के लिए…पति के लिए…किंतु उस वक्त मृत्यु की यह इच्छा उस स्वजन के लिए जीवन सरीखी होती है जो बरसों बरस से बिस्तर पर निढाल पड़ा है।
केवल कहने को शरीर जीवित है… दवाओं के भरोसे… मेडिकल इक्विटमेंट्स के भरोसे… सुधार कोई नहीं… बस अनंत पीड़ा… अस्पताल या घर के किसी कमरे में शय्या पर पड़े उस व्यक्ति को और उसके स्वजन को जो उसे देखकर द्रवित भी हैं… कर कुछ नहीं पा रहे… तब सामने आता है इच्छामृत्यु का विकल्प… जीवंतता की बात करने वाले संसार में मृत्यु की इच्छा का अतिपीड़ादायक विकल्प…
देश में इस तरह का यह पहला मामला
गाजियाबाद के हरीश राणा के मामले में सुप्रीम कोर्ट से मिली पैसिव यूथेनेसिया (Passive Euthanasia) की अनुमति इसी कठिन सवाल को फिर चर्चा के केंद्र में ले आई है। देश में इस तरह का यह पहला मामला माना जा रहा है। यह फैसला एक ओर जहां हरीश के माता-पिता और भाई की वर्षों की पीड़ा से जुड़ा है, वहीं उन तमाम परिवारों के लिए भी एक राह खोलता है जो न चाहते हुए भी अपने किसी प्रियजन के लिए मृत्यु की अनुमति मांगने की स्थिति में पहुंच जाते हैं।
हरीश राणा के पिता अशोक राणा की आंखों में भी शायद यही असहाय प्रश्न और पीड़ा झलकती है। इसी के साथ यह सवाल भी सामने आता है कि इच्छामृत्यु आखिर होती क्या है? भारत में इसके क्या नियम हैं? इसे कब और किन परिस्थितियों में अनुमति दी जाती है? और दुनिया के अन्य देशों में इस पर क्या कानून हैं? आइए कुछ सवाल-जवाब के जरिए समझते हैं।
