नई दिल्ली, न्यूज़ डेस्क : आवश्यकता ही आविष्कार की जननी है। यानी इंसान को जब-जब जिस की जरूरत पड़ी, उसने उसका आविष्कार किया। पाषाण काल में आग से लेकर पहिये का आविष्कार भी ऐसे ही हुआ था। एक बार फिर भारत ने ऐसा ही किया है। ईरान द्वारा दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा शिपिंग रूट स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज को बंद करने के बाद भारत ने LPG गैस का नया विकल्प ढूंढ लिया है। इससे आने वाले दिनों में भारत की एलपीजी आयात पर निर्भरता कम होगी और सरकार के लाखों करोड़ रुपये बचेंगे। आइए जानते हैं कि भारत ने ऐसा क्या किया है?
स्वदेशी तकनीक विकसित की गई
CSIR-नेशनल केमिकल लेबोरेटरी (CSIR-NCL) के वैज्ञानिकों ने Dimethyl Ether (DME) बनाने के लिए एक स्वदेशी तकनीक विकसित की है। यह एक साफ जलने वाला ईंधन है जिसे Liquefied Petroleum Gas (LPG) के साथ मिलाया जा सकता है। संस्थान द्वारा DME एक साफ़ जलने वाला सिंथेटिक ईंधन है जो पारंपरिक ईंधनों की तुलना में कालिक, नाइट्रोजन ऑक्साइड (NOx), सल्फर ऑक्साइड (SOx) और कणों (particulate matter) का उत्सर्जन काफी कम करता है, जबकि इसकी तापीय दक्षता (thermal efficiency) पारंपरिक ईंधनों के बराबर ही होती है। भारतीय मानक ब्यूरो (BIS) ने पहले ही मानक IS 18698:2024 जारी कर दिया है, जो घरेलू, वाणिज्यिक और औद्योगिक उपयोगों के लिए LPG के साथ 20 प्रतिशत तक DME मिलाने की अनुमति देता है।
₹9,500 करोड़ की होगी बचत
विशेषज्ञों का कहना है कि LPG के साथ 8 प्रतिशत तक DME बिना किसी मौजूदा बुनियादी ढांचे (जैसे सिलेंडर, रेगुलेटर, होज़ और बर्नर) में बदलाव किए मिलाया जा सकता है। भारत ने 2024 में लगभग 21 मिलियन टन LPG का आयात किया। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि LPG के सिर्फ 8 प्रतिशत हिस्से को DME से बदलने पर हर साल लगभग ₹9,500 करोड़ की विदेशी मुद्रा की बचत हो सकती है। उज्ज्वला योजना के तहत 10.5 करोड़ LPG कनेक्शनों के लिए इस तरह के बदलाव के लिए प्रतिदिन लगभग 1,300 टन DME उत्पादन क्षमता की ज़रूरत होगी।
कुकिंग ईंधन के अलावा, DME का उपयोग ऑटोमोटिव ईंधन के रूप में और एयरोसोल उत्पादों में प्रोपेलेंट के रूप में भी किया जा सकता है, जो ओज़ोन को नुकसान पहुंचाने वाले क्लोरोफ्लोरोकार्बन (CFCs) की जगह ले सकता है। यह कम ओलेफिन, डाइमिथाइल सल्फेट और मिथाइल एसीटेट के उत्पादन के लिए एक रासायनिक मध्यवर्ती के रूप में भी काम कर सकता है।
जल्द कमर्शियल प्रोडक्शन की तैयारी
अब, CSIR-NCL एक प्रोसेसिंग इंजीनियरिंग पार्टनर के साथ मिलकर, इस तकनीक को 6-9 महीनों के अंदर हर दिन 2.5 टन उत्पादन करने वाले एक इंडस्ट्रियल लेवल के डेमो प्लांट तक बढ़ाने के लिए तैयार है। यह डेमो प्लांट हर दिन 500-1000 टन की क्षमता वाले कमर्शियल प्लांट लगाने का रास्ता साफ कर देगा। CSIR-NCL के डायरेक्टर डॉ. आशीष लेले ने आज एक मीडिया कॉन्फ्रेंस में कहा, “CSIR-NCL बड़े तेल PSUs और बायोएनर्जी कंपनियों के साथ कमर्शियल लेवल पर उत्पादन के लिए पार्टनरशिप करने का इच्छुक है।”
