“फ्लावर नहीं, फायर हूं मैं”: कैंसर से जंग जीतकर मिसाल बनीं पुष्पा सिंह

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नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क : “पुष्पा… नाम सुनकर फ्लावर समझे क्या? फायर है मैं…” यह संवाद भले ही फिल्मी हो, लेकिन पुष्पा सिंह की जिंदगी पर पूरी तरह सटीक बैठता है। उनकी कहानी सिर्फ कैंसर से लड़ाई की नहीं, बल्कि साहस, आत्मविश्वास और दूसरों के लिए जीने की प्रेरणा की कहानी है।

जिंदगी का सबसे बड़ा झटका और नई शुरुआत

साल 2014 में उन्होंने अपने जीवनसाथी को खो दिया। यह ऐसा दुख था जिसने उनकी जिंदगी की दिशा बदल दी। वह इस दर्द से उबर ही रही थीं कि 2016 में, 57 वर्ष की उम्र में, उन्हें ब्रेस्ट कैंसर का पता चला। यह खबर किसी को भी तोड़ सकती थी, लेकिन उन्होंने हार मानने से इनकार कर दिया।

उन्होंने कहा, “मृत्यु तो एक दिन सभी को आनी है, लेकिन उससे पहले जीने के लिए एक खूबसूरत जिंदगी भी है।” यही सोच उनके संघर्ष की ताकत बनी।

दर्द से लड़कर बनीं मजबूत

इलाज का सफर आसान नहीं था। अस्पताल के लंबे दिन, दर्द और अनिश्चितता से भरी रातें—सब कुछ उन्होंने झेला, लेकिन उनकी इच्छाशक्ति अटूट रही। उन्होंने हर मुश्किल को स्वीकार किया, लेकिन उसे अपनी पहचान नहीं बनने दिया।

पति के जाने के बाद परिवार में दो बेटे, बहुएं और पोते होने के बावजूद कभी-कभी अकेलापन महसूस होता था। लेकिन उन्होंने इस अकेलेपन को खुद पर हावी नहीं होने दिया। उन्होंने अपनी जिंदगी को नए सिरे से जीने का फैसला किया।

पुष्पा सिंह ने सोलो ट्रैवलिंग शुरू की। देश के कोने-कोने में घूमते हुए उन्होंने खुद को फिर से खोजा। पहाड़, समंदर, शहर और गांव—हर जगह उन्होंने जिंदगी को नए नजरिए से जिया। हर यात्रा उनके आत्मविश्वास को और मजबूत करती गई।

उन्होंने स्मार्टफोन और सोशल मीडिया का उपयोग करना सीखा और व्हाट्सएप स्टेटस के जरिए अपने जीवन के पल साझा करने लगीं। उनकी मुस्कान, उनका सफर और उनकी जीत—सब कुछ दूसरों के लिए प्रेरणा बन गया।

दूसरों के लिए बनीं सहारा

अपने अनुभवों से गुजरने के बाद वह दूसरों के लिए ताकत बन गईं। जब भी कोई मुश्किल में होता, वह उसके साथ खड़ी रहतीं—कभी शब्दों से, कभी खामोशी से और कभी सिर्फ अपनी मौजूदगी से।

उन्होंने समाज में अपनी पहचान एक मजबूत, संवेदनशील और मददगार इंसान के रूप में बनाई। बिना किसी अपेक्षा के लोगों की मदद करना उनकी आदत बन गई। उनकी जिंदगी यह सिखाती है कि असली जीत सिर्फ खुद संभलने में नहीं, बल्कि दूसरों को संभालने में भी है।

उनके पोते उनकी जिंदगी की सबसे बड़ी खुशी हैं। पिछले 10 वर्षों से वह नियमित जांच और इलाज करवा रही हैं और उन्होंने कभी शिकायत नहीं की। उन्होंने हर परिस्थिति में कृतज्ञता को चुना।

वह कहती हैं, “मैं पुष्पा हूं—एक फूल, जो सुंदर है लेकिन क्षणभंगुर भी… और मैं सिंह भी हूं—बेखौफ।” उनका नाम ही उनकी पहचान है—नरमी और ताकत का अद्भुत संगम।

वह दिल्ली स्टेट कैंसर इंस्टीट्यूट के डॉक्टरों और स्टाफ का आभार जताती हैं, जिन्होंने हर कठिन समय में उनका साथ दिया। साथ ही, वह हर नए दिन के लिए भगवान का धन्यवाद करती हैं।

आज पुष्पा सिंह सिर्फ एक कैंसर सर्वाइवर नहीं, बल्कि साहस, करुणा और जीवन के प्रति प्रेम की जीती-जागती मिसाल हैं। उनकी कहानी सिखाती है कि जिंदगी हमें क्या देती है, यह नहीं, बल्कि हम उसे कैसे जीते हैं, यही सबसे महत्वपूर्ण है।

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