नई दिल्ली,डिजिटल डेस्क : भारत की सांस्कृतिक विरासत को बचाने की कोशिशों के लिए एक बड़ी जीत को तौर पर, नीदरलैंड प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की यात्रा के दौरान मशहूर ‘अनैमंगलम तांबे की प्लेटे’ जिन्हें लीडेन प्लेटें भी कहा जाता है, भारत को लौटाने जा रहा है।
11वीं सदी के चोल राजनंश के ये ऐतिहासिक अनशेष, जो तीन सदियों से भी ज्यादा समय से लीडेन यूनिवर्सिटी में रखे थे, तमिल इतिहास की शान और दक्षिण भारत के सबसे ताकतवत साम्राज्यों में से एक की विश्वव्यापी सोच को दिखाते हैं।
चोल साम्राज्य की तांबे की प्लेटें
लगभग 30 किलो वजन वाली और 21 प्लेटों से बनी ये प्लेटें, एक कांस्य की अंगूठी से जुड़ी हैं जिस पर राजेंद्र चोल I की शाही मुहर लगी है। इन पर लिखे लेख सम्राट राजाराजा चोल I (985–1014 ईस्वी) और उनके बेटे राजेंद्र के शासनकाल के हैं। संस्कृत वाला हिस्सा चोलों की वंशावली बताता है, जिसमें पूर्वजों की एक कड़ी के जरिए भगवान विष्णु से अपनी सत्ता को दैवीय मान्यता दी गई है।
लेकिन, तमिल वाला हिस्सा इस तमिल खजाने का सबसे अहम हिस्सा है। इसमें राजाराजा द्वारा अनैमंगलम के पास के गांवों से मिलने वाले राजस्व को नागपट्टिनम के हलचल भरे बंदरगाह में बने एक बौद्ध विहार (मठ) को दान देने का जिक्र है। इस मठ को श्रीविजय के मलय राजा ने बनवाया था।
संरक्षण की विरासत आज भी तमिल पहचान
अपने सुनहरे दौर में, चोलों ने जो असल में तमिल राजवंश के थे, दक्षिण भारत और श्रीलंका के ज्यादातर हिस्सों पर राज किया और दक्षिण-पूर्व एशिया में साहसी नौसैनिक अभियान चलाए। उनकी शानदार मंदिर वास्तुकला (जैसे तंजावुर का बृहदेश्वर मंदिर), प्रशासनिक सुधारों, और तमिल साहित्य व कलाओं को दिए गए संरक्षण की विरासत आज भी तमिल पहचान का मुख्य आधार है।
ये प्लेटें, जिन्हें राजेंद्र की पहल पर उनके पिता के मौखिक आदेश को हमेशा के लिए अमर करने के लिए मजबूत तांबे पर उकेरा गया था, चोल सभ्यता के इस सुनहरे दौर का एक दुर्लभ और सीधा प्रमाण हैं।
1700 ईस्वी में विदेश पहुंची तांबे की प्लेटें
इन प्लेटों का विदेश जाने का सफर लगभग 1700 ईस्वी में शुरू हुआ, जब डच मिशनरी फ्लोरेंटियस कैंपर ने इन्हें उस समय हासिल किया जब डच ईस्ट इंडिया कंपनी का नागपट्टिनम पर कब्जा था। आखिरकार ये प्लेटें लीडेन यूनिवर्सिटी की लाइब्रेरी में पहुंच गईं, जहां विद्वानों ने इन पर शोध तो किया, लेकिन आम लोगों के लिए ये ज्यादातर पहुंच से बाहर ही रहीं।
ऐतिहासिक चीजों को वापस लाने का अभियान
भारत का इन ऐतिहासिक चीजों को वापस लाने का अभियान, जो 2012 से तेज हुआ था, 2023 में UNESCO की अंतर-सरकारी समिति से और भी मजबूत हुआ। इस समिति ने भारत के इस दावे को सही ठहराया कि ये चीजें मूल रूप से भारत की ही हैं, और दोनों देशों के बीच बातचीत करने की अपील की।
यह वापसी न केवल कलाकृतियों की पुनःप्राप्ति का प्रतीक है, बल्कि तमिलनाडु की चोल विरासत के साथ एक पुनर्संबंध का भी प्रतीक है। एक ऐसी सभ्यता जिसने हिंद महासागर के पार भक्ति, व्यापार और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का मेल किया था। उम्मीद है कि उनकी यह वापसी चोल अध्ययनों में नए सिरे से रुचि जगाएगी।
