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कानपुर, संवाददाता : प्रशांत महासागर में अल नीनो के मजबूत होने से मानसूनी बारिश कम होने और सूखा पड़ने का अनुमान लगाया जा रहा है लेकिन अल नीनो प्रभाव में भी बारिश होती है। सिर्फ सूखे दिनों की संख्या बढ़ जाती है। बारिश के दिनों के बीच की अवधि लंबी हो जाती है। चंद्रशेखर आजाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विवि के मौसम विभाग के आंकड़ों से पता चला कि अल नीनो प्रभाव के मजबूत होने से जून में बारिश कम हुई लेकिन सितंबर-अक्तूबर तक खिंच गई।

अल नीनो में प्रशांत महासागर की सतह गर्म हो जाती है। मानसून प्रभावित होता है। अल नीनो का चक्र हर दो और सात साल में आता है। यह प्रभाव नौ से 12 महीने तक सक्रिय रहता है। वर्ष 1982, 89, 91, 97 और वर्ष 2015 में अल नीनो प्रभाव बहुत मजबूत रहा है। जब इन वर्षों में बारिश का आंकड़ा देखा गया तो इस दौरान भी काफी बारिश हुई पर अधिक बारिश अगस्त, सितंबर में हुई। इसकी अवधि अक्तूबर और नवंबर तक खिंच गई।

सीएसए के मौसम विभाग के नोडल एवं तकनीकी अधिकारी अजय मिश्रा ने बताया कि अल नीनो के अधिक मजबूत प्रभाव वाले वर्षों में बारिश हुई है। फर्क यह आता है कि लगातार बारिश नहीं हुई। बारिश के दिनों के बीच का गैप बढ़ गया। बीच के दिनों में सूखा रहा। यह गैप कभी 20 दिन से एक महीने तक हो सकता है पर बीच में एक बार में इकट्ठी बारिश हो जाती है। इसके अलावा लंबी दूरी तक पानी नहीं गिरता। स्थानीय स्तर पर अलग-अलग टुकड़ों में बारिश होती है।

अल नीनो कमजोर होने पर होती लंबी दूरी तक बारिश
अल नीनो कमजोर होने पर मानसूनी बारिश अच्छी होती है और लंबी दूरी तक होती है। अल नीनो के अधिक मजबूत होने पर पॉकेट वर्षा होती है। एक जगह पानी गिरता है और दूसरी जगह सूखा रहता है। इसके मानसून के सूखे दिनों की संख्या कम होती है और इनके बीच का अंतर कम होता है।