नई दिल्ली, एंटरटेनमेंट डेस्क : जरूरी नहीं हर क्लासिक सॉन्ग्स को बनाने वाले दिग्गज कलाकार अमर हो जाए। कुछ गुमनामी में रहकर भी अपनी काबिलियत के दम पर धमाल मचाते हैं। 70 औ 80 के दशक में भी एक ऐसे गीतकार थे, जिन्होंने हिट गानों की लाइन लगा दी थी। मगर उन्हें वैसी लोकप्रियता नहीं मिली, जिसके वह हकदार थे। यही नहीं, समय के साथ इंडियन सिनेमा ने उस ‘नायाब हीरा’ को भुला दिया। जिस गीतकार की हम बात कर रहे हैं, वो हैं गौहर कानपुरी (Gauhar Kanpuri)। बहुत कम लोग ही गौहर कानपुरी के बारे में जानते होंगे। वह उत्तर प्रदेश के शहर कानपुर में जन्मे थे। वह एक बेहतरीन कवि होने के साथ-साथ गीतकार थे। उन्हें गीतकार बनना था और इस ख्वाब को पूरा करने के लिए वह 60 के दशक में बंबई (मुंबई) आ गए। 60s में शुरू किया था करियर फिल्मी बैकग्राउंड्स से थे नहीं, इसलिए सामने कई चुनौतियां भी आईं। आखिरकार संघर्ष के बाद उन्हें पहला गाना लिखने का मौका मिला। उन्होंने पहली बार फिल्म ‘प्यार की बाजी'(1967) के लिए गाना ‘हसीनों का दीदार करना बुरा है’ लिखा है। यह कव्वाली सॉन्ग था जिसे महेंद्र कपूर और उषा मंगेशकर ने अपनी आवाज दी थी। म्यूजिक जिम्मी का था। इस गाने को खूब पसंद किया गया। मगर कहा जाता है कि गौहर को अपना दूसरा प्रोजेक्ट पाने के लिए तीन साल का इंतजार करना पड़ा। बप्पी लहरी संग दिए सबसे ज्यादा गाने धीरे-धीरे उन्हें गाने मिलने शुरू हुए। उन्होंने ‘कोरा आंचल’, ‘जख्मी’, ‘दो खिलाड़ी’ और ‘संगम’ जैसी फिल्मों के लिए गीत बनाए। उनका सबसे ज्यादा कोलैबरेशन बप्पी लहरी के साथ हुआ। म्यूजिक डायरेक्टर बप्पी लहरी ने गौहर का टैलेंट पहचाना और उन्होंने अपनी काबिलियत दिखाई। इसके अलावा वह राम-लक्ष्मण, जयदेव, उषा खन्ना, नदीम-श्रवण और राजकमल जैसे संगीतकार के साथ भी काम कर चुके थे। Post navigation ‘वैभव सूर्यवंशी को सेलेक्ट करना चाहिए था’- सुनील गावस्कर कंधे कलाई और घुटने में चोट, किशोरी को बंधक बनाकर धर्मांतरण का दबाव