नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क : भारत ने रक्षा और एयरोस्पेस तकनीक की दुनिया में एक बहुत बड़ा मील का पत्थर हासिल कर लिया है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन (DRDO) ने देश का पहला 350 किलोग्राम थ्रस्ट-क्लास एक्सपेंडेबल टर्बोजेट इंजन सफलतापूर्वक तैयार कर लिया है। इस बड़ी उपलब्धि के साथ ही भारत अब दुनिया के उन चुनिंदा देशों के खास क्लब में शामिल हो गया है, जो खुद अपने दम पर मिसाइलों और ड्रोनों में इस्तेमाल होने वाले आधुनिक जेट इंजन डिजाइन और तैयार कर सकते हैं। इस इंजन को किसने बनाया और इसका इस्तेमाल कहां होगा ? इसे DRDO की बेंगलुरु स्थित लैब गैस टर्बाइन रिसर्च इस्टैब्लिशमेंट (GTRE) ने डिजाइन किया है। इसे हैदराबाद की निजी कंपनी आजाद इंजीनियरिंग ने तैयार किया है। इसके इतर यह एक ‘एक्सपेंडेबल’ यानी एक बार इस्तेमाल होने वाला इंजन है। इसका उपयोग क्रूज मिसाइल, जेट-पावर्ड सुसाइड ड्रोन (लोइटरिंग म्यूनिशन), टारगेट ड्रोन और मानव रहित विमानों (UAV) में किया जाएगा। यह इंजन क्यों इतना खास है ? इस बात को ऐसे समझा जा सकता है कि जेट इंजन बनाना एयरोस्पेस इंजीनियरिंग के सबसे कठिन कामों में से एक माना जाता है। रॉकेट के विपरीत, टर्बोजेट इंजन लगातार हवा खींचता है, उसे दबाता है, ईंधन जलाता है और भारी ताकत पैदा करता है। इसमें बहुत ही उच्च कोटि की एयरोडाइनेमिक्स, गर्मी सहने वाले मेटल और बारीक कारीगरी की जरूरत होती है। स्वदेशी तकनीक के आने से भारत को क्या बड़े फायदे होंगे ? अब तक भारत इस तरह के छोटे जेट इंजनों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर था। स्वदेशी तकनीक आने से भविष्य के मिसाइल कार्यक्रमों में किसी भी तरह की रुकावट का डर खत्म हो जाएगा। खास बात यह भी है कि टर्बोजेट इंजन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ विजन को रक्षा क्षेत्र में एक और बड़ी मजबूती देता है। इसके अलावा देश में ही इंजन बनने से ये रक्षा उपकरण कम कीमत पर और आसानी से बड़े पैमाने पर तैयार किए जा सकेंगे। एक्सपेंडेबल टर्बोजेट इंजन आखिर होता क्या है ? बता दें कि फाइटर जेट्स के इंजन ऐसे होते हैं जो हजारों घंटे उड़ने के लिए बनाए जाते हैं और बार-बार इस्तेमाल होते हैं। इसके विपरीत, एक्सपेंडेबल इंजन केवल एक ही मिशन के लिए बनाए जाते हैं। एक बार मिसाइल या ड्रोन लॉन्च होने के बाद यह इंजन उसे उसके लक्ष्य तक पहुंचाकर नष्ट हो जाता है। इसलिए, इन्हें लंबे जीवन के बजाय सरल, अत्यधिक भरोसेमंद, छोटे आकार और कम लागत के हिसाब से डिजाइन किया जाता है। भविष्य में यह इंजन किन-किन हथियारों को ताकत देगा ? यह इंजन लंबी दूरी की क्रूज मिसाइलों को कम ऊंचाई पर तेजी से उड़ान भरने में मदद करेगा, जिससे दुश्मन के ठिकानों को सटीक निशाना बनाया जा सकेगा। इसके साथ ही आम प्रोपेलर वाले ड्रोन की तुलना में जेट इंजन वाले ड्रोन 400 किमी/घंटा से ज्यादा की रफ्तार पकड़ सकते हैं। इन्हें रोकना दुश्मन के लिए बेहद मुश्किल होता है। सेना के एयर डिफेंस सिस्टम का परीक्षण करने के लिए दुश्मन जैसी रफ्तार वाले टारगेट ड्रोन बनाने में यह काम आएगा और फिर जासूसी और विशेष अभियानों के लिए तेज रफ्तार मानवरहित विमानों में इसका इस्तेमाल होगा। क्या यह फाइटर जेट के इंजन जैसा है ? बिल्कुल नहीं। जानकारों के मुताबिक, फाइटर विमानों के लिए भारी-भरकम ‘टर्बन’ इंजन चाहिए होते हैं जो हजारों घंटे और चरम तापमान में काम कर सकें। वहीं, यह नया इंजन एक छोटे और सिंगल-यूज मिशन के लिए है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि छोटे इंजन बनाने की यह तकनीक भविष्य में भारत के लिए बड़े और ताकतवर फाइटर जेट इंजन जैसे कावेरी इंजन प्रोजेक्ट बनाने का रास्ता भी आसान करेगी, क्योंकि इससे हमारे वैज्ञानिकों का अनुभव और आत्मविश्वास दोनों बढ़ेगा। किन देशों के पास है यह खास तकनीक? गौरतलब है कि अब तक यह तकनीक केवल गिने-चुने देशों के पास थी। इसमें अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन जैसे देश शामिल है। ऐसे में अब इस सूची में भारत का नाम भी गर्व से जुड़ गया है। दूसरी ओर यह उपलब्धि दिखाती है कि भारत अब केवल हथियार खरीदने वाला देश नहीं, बल्कि भविष्य के युद्धों के लिए खुद अत्याधुनिक तकनीक तैयार करने वाला देश बनता जा रहा है। Post navigation मध्य भारत : टाइगर कॉरिडोर से गुजरने वाली रेल लाइन को सैद्धांतिक मंजूरी भारत-पाकिस्तान मैच में एशियन लीजेंड्स लीग में भारत ने पाक को हराया