नारायणपुर, संवाददाता : अबूझमाड़ में बरसात का मतलब केवल हरियाली नहीं, बल्कि कई गांवों का दुनिया से कट जाना भी होता है। उफनते नाले रास्ते निगल लेते हैं और इलाज, पढ़ाई, बाजार तथा जरूरी सेवाओं तक पहुंच थम जाती है। इस बार आईटीबीपी की 44वीं वाहिनी ने ऐसी ही मुश्किलों के बीच उम्मीद के पुल खड़े किए हैं। ओरछा ब्लॉक के 14 गांवों में जवानों ने स्थानीय लकड़ी और उपलब्ध संसाधनों से अस्थायी फुट ब्रिज तैयार किए हैं। इन पुलों से अब ग्रामीण और दोपहिया वाहन चालक सुरक्षित आवाजाही कर रहे हैं। वर्षों से बरसात में जिन नालों को पार करना जान जोखिम में डालने जैसा था, वहां अब लोगों की आवाजाही फिर से शुरू हो गई है। सुरक्षा के साथ-साथ सुगम जीवन की दिशा में कदम माओवाद प्रभावित रहने के कारण इस इलाके में लंबे समय तक सड़क और पक्के पुलों का विकास नहीं हो सका। हर मानसून में गांवों का संपर्क टूट जाता था। कई बार बीमारों को चारपाई पर उठाकर नाले पार कराए जाते थे, जबकि बच्चों की पढ़ाई और ग्रामीणों की रोजमर्रा की जरूरतें भी प्रभावित होती थीं। ग्रामीण माड़वी भीमा कहते हैं कि पहले बरसात आते ही गांव खुद को दुनिया से कटा हुआ महसूस करता था, लेकिन अब पुल बनने से काफी राहत मिली है। कुतुल गांव की हिडमे कवासी बताती हैं कि बच्चों का स्कूल जाना अब पहले की तुलना में अधिक सुरक्षित हो गया है। ग्रामीणों के लिए नई जीवनरेखा 44वीं वाहिनी के सेनानी सिद्धिक पी. पी. ने कहा कि आईटीबीपी केवल सुरक्षा ही नहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के जीवन को सुगम बनाने के लिए भी प्रतिबद्ध है। स्थायी पुल बनने तक ये अस्थायी पुल हजारों ग्रामीणों के लिए जीवनरेखा बने रहेंगे। Post navigation नीलकंठ में गूंज रहे बम-बम भोले के जयकारे CG : दक्षिण पूर्व मध्य रेलवे में तेजी से लागू हो रही स्वदेशी ‘कवच’ प्रणाली