नई दिल्ली,,डिजिटल डेस्क : कानूनी विशेषज्ञों ने बुधवार को कहा कि इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के विरुद्ध अब एफआईआर दर्ज की जा सकती है, क्योंकि लोकसभा स्पीकर द्वारा गठित तीन सदस्यीय जांच समिति ने उन्हें सरकारी आवास पर नकदी मिलने के आरोपों का दोषी पाया है। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि महाभियोग की प्रक्रिया स्वत: खत्म हो गई है क्योंकि जस्टिस वर्मा ने इस्तीफा दे चुके हैं। वरिष्ठ अधिवक्ता एवं संवैधानिक कानून के विशेषज्ञ राकेश द्विवेदी ने कहा कि अगर कोई नया कदम उठाया जाता है तो जस्टिस वर्मा के विरुद्ध एफआइआर दर्ज करने की याचिकाओं को सुप्रीम कोर्ट द्वारा खारिज करने का कोई असर नहीं पड़ेगा। उन्होंने कहा, “अब रिपोर्ट संसद में पेश कर दी गई है और वह पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं, इसलिए उन्हें हटाया नहीं जा सकता। इसलिए महाभियोग प्रस्ताव स्वत: खत्म हो गया है। मेरी राय में यह बेअसर हो गया है, लेकिन रिपोर्ट के आधार पर एफआइआर निश्चित रूप से दर्ज की जा सकती है।” रिष्ठ अधिवक्ता और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह ने कहा कि चूंकि अभी तक इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया है, इसलिए उनकी राय में जस्टिस वर्मा पर महाभियोग चलाया जा सकता है वरिष्ठ अधिवक्ता और सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन के अध्यक्ष विकास सिंह ने कहा कि चूंकि अभी तक इस्तीफा स्वीकार नहीं किया गया है, इसलिए उनकी राय में जस्टिस वर्मा पर महाभियोग चलाया जा सकता है। उन्होंने कहा, “इस्तीफे की स्थिति में उन्हें पेंशन पाने का अधिकार होगा। लेकिन अगर उन पर महाभियोग चलाया जाता है, तो उन्हें पेंशन का लाभ नहीं मिलेगा। दूसरी बात अगर जांच समिति ने कहा है कि एफआइआर दर्ज की जानी चाहिए, तो एफआइआर दर्ज की जानी चाहिए।” जाने-माने संवैधानिक विशेषज्ञ और वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन ने कहा कि महाभियोग का सवाल ही नहीं उठता क्योंकि उन्होंने पहले ही अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। उन्होंने कहा, “मेरी राय में संसद का अधिकार क्षेत्र अब खत्म हो गया है। जहां तक एफआइआर की बात है, संसदीय कार्यवाही इसमें बाधा नहीं बन सकती। जब वह जज थे, तो प्रधान न्यायाधीश की मंजूरी लेना जरूरी था क्योंकि जज के तौर पर उन्हें छूट (इम्युनिटी) हासिल थी। लेकिन अब वह छूट खत्म हो गई है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि उन्होंने इस्तीफा दे दिया है। इस मामले की ठीक से जांच होनी चाहिए और यह केवल आपराधिक कार्यवाही से ही संभव है।” वरिष्ठ वकील गोपाल शंकरनारायणन ने कहा, उन्हें नहीं लगता कि समिति की रिपोर्ट के आधार पर जस्टिस वर्मा के विरुद्ध एफआइआर दर्ज की जा सकती है। ऐसा लगता है कि समिति ने यह बताने की पूरी जिम्मेदारी जस्टिस वर्मा पर डाल दी है कि पैसा कहां से आया उन्होंने कहा, “ऐसा लगता है कि समिति ने यह बताने की पूरी जिम्मेदारी जस्टिस वर्मा पर डाल दी है कि पैसा कहां से आया। अगर लुटियंस की दिल्ली में एक एकड़ के बंगलों में रहने वाले सभी लोगों से उनके आउटहाउस में मिली चीजों के बारे में पूछा जाए, तो मुझे यकीन है कि सैकड़ों एफआइआर दर्ज करनी पड़ेंगी।” वरिष्ठ वकील और इलाहाबाद हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष अनिल तिवारी ने कहा कि अब एफआइआर दर्ज की जा सकती है। उन्होंने कहा, “जजों को मिली छूट उन्हें अपनी न्यायिक शक्तियों के दायरे में ठीक से काम करने की आजादी देती है, लेकिन उन्हें घर पर इतना पैसा रखने की इजाजत नहीं देती। उन्होंने पहले ही इस्तीफा दे दिया है, सरकार को अब आगे बढ़ना चाहिए और कानून मंत्रालय को इस मामले में पहल करके एफआइआर दर्ज करानी चाहिए। इस मामले में मुकदमा चलना चाहिए। वह कोलेजियम सिस्टम की देन हैं और यह घटना कोलेजियम सिस्टम पर भी सवाल उठाती है।” एक अन्य वरिष्ठ अधिवक्ता अनिल सोनी ने कहा कि जस्टिस वर्मा अब जज नहीं हैं, इसलिए उनके विरुद्ध एफआइआर दर्ज की जानी चाहिए और मामले की गहन जांच होनी चाहिए। Post navigation फ्रांस से 114 फाइटर राफेल की मेगा डील पर चीन-पाक की पैनी नजर छह गेंदों पर 6 छक्के, टोबी अल्बर्ट ने मचाई धूम और बना दिया रिकॉर्ड