Iran Crisis : अब भारत की शरण में US ! ट्रंप प्रशासन ने सरकार से मांगी मदद

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नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क : Crude Oil Price Diplomacy : ईरान युद्ध के बीच सुपरपावर अमेरिका बैकफुट पर आ गया है। दरअसल कच्चे तेल की कीमत में रिकॉर्ड बढ़ोतरी को देखते हुए अमेरिका ने भारत से अनुरोध किया है कि वह समुद्री परिवहन में पहले से मौजूद रूसी कच्चे तेल को खरीदकर उसे भारतीय रिफाइनरियों की ओर मोड़ दे, ताकि मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष के बीच आपूर्ति में संभावित कमी और कीमतों में उछाल की आशंकाओं को कम किया जा सके। अमेरिका के ऊर्जा मंत्री क्रिस राइट ने कहा कि यह कदम बाजार को स्थिर रखने के लिए एक अल्पकालिक और व्यावहारिक प्रयास है।

भारतीय अधिकारियों से बात की
उन्होंने रविवार को ‘सीएनएन’ को दिए एक साक्षात्कार में कहा कि उन्होंने वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट के साथ मिलकर भारतीय अधिकारियों से बात की थी ताकि चीनी रिफाइनरियों में उतारे जाने की प्रतीक्षा कर रहे रूसी कच्चे तेल के कार्गो को भारत खरीद सके। राइट ने कहा कि भारत इस मामले में एक अच्छा सहयोगी रहा है। मैंने और वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने भारतीय अधिकारियों से फोन पर बात की और कहा कि अभी बहुत सारा तेल चीन की रिफाइनरियों में उतारा जाना है। उन्होंने कहा कि वहां तेल को उतारने के लिए छह सप्ताह तक इंतजार कराने के बजाय, इसे पहले ही भारत खरीदकर अपनी रिफाइनरियों में भेजे ताकि तेल की कमी की आशंका, कीमतों में अचानक बढ़ोतरी और बाजार में व्याप्त चिंताओं को कम किया जा सके।

अमेरिकी की नीति में कोई बदलाव नहीं आया

इसके साथ ही उन्होंने दोहराया कि रूस के प्रति अमेरिकी नीति में कोई बदलाव नहीं आया है और भारत इस बात को लेकर पूरी तरह स्पष्ट है। जब उनसे पूछा गया कि क्या रूसी तेल खरीद के लिए भारत को दी गई 30 दिनों की छूट से ट्रंप प्रशासन का रूस को अलग-थलग करने का लक्ष्य कमजोर होता है, उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं है। यह केवल एक व्यावहारिक कदम है और इसका असर केवल अल्पकालिक है।

रूस के प्रति नीति में कोई बदलाव नहीं हुआ। वित्त मंत्रालय की तरफ से पिछले हफ्ते दी गई छूट के तहत भारत 30 दिनों तक रूस से कच्चा तेल खरीद सकता है। इसके पहले ट्रंप प्रशासन ने रूस से तेल खरीदने पर भारतीय उत्पादों पर 25 प्रतिशत दंडात्मक शुल्क लगा दिया था। लेकिन पिछले महीने अंतरिम व्यापार समझौते पर बनी सहमति के तहत इस शुल्क को हटाने की बात कही गई थी। संयुक्त राष्ट्र में अमेरिकी राजदूत माइक वाल्ट्ज ने भी इस निर्णय का समर्थन करते हुए कहा कि यह एक अस्थायी और व्यावहारिक उपाय है।