नई दिल्ली, संवाददाता : केन्द्रीय संस्कृति मंत्रालय के संस्थान राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) आयोजित भारत रंग महोत्सव 2026 (भारंगम) दौरान इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केन्द्र के सदस्य सचिव डॉ. सच्चिदानंद जोशी द्वारा लिखित नाटक ‘उम्मीद – मनुष्य ज़िंदा है’ का लोकार्पण एवं उस पर केन्द्रित परिचर्चा संपन्न हुई। परिचर्चा में एनएसडी के पूर्व निदेशक प्रो. वामन केन्द्रे, सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र (सीसीआरटी) के डॉ. विनोद नारायण इंदुलकर एवं नाटक के लेखक डॉ. सच्चिदानंद जोशी ने नाटक के कथ्य, शिल्प, रंगमंचीयता और हिन्दी नाटकों के परिदृश्य पर सार्थक एवं सारगर्भित चर्चा की।
इस अवसर पर, एनएसडी के निदेशक चितरंजन त्रिपाठी भी उपस्थित थे। अंत में, वक्ताओं ने दर्शकों के प्रश्नों का उत्तर भी दिया।
डॉ. सच्चिदानंद जोशी द्वारा किए गए कार्यों की सराहना
प्रो. वामन केंद्रे ने अपने संबोधन की शुरुआत डॉ. सच्चिदानंद जोशी द्वारा किए गए कार्यों की सराहना से की। उन्होंने कहा कि डॉ. जोशी ने जिस प्रकार आईजीएनसीए के सांस्कृतिक परिदृश्य को रूपांतरित किया है, वह उदाहरणीय है। उनके नेतृत्व में आईजीएनसीए देश का एक प्रमुख सांस्कृतिक केंद्र बनकर उभरा है। पुस्तक के संदर्भ में उन्होंने कहा कि मूलतः यह ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भारतीय अवधारणा से आरंभ होती है। मनुष्य भले ही स्वयं को बांट ले, विचारों में भिन्नता हो सकती है, लेकिन ये ‘मतभेद’ कभी भी ‘मनभेद’ में परिवर्तित नहीं होना चाहिए।
उन्होंने कहा कि यह नाटक वर्तमान और अतीत की गतिशीलता से संवाद करता है और इसी प्रक्रिया में दर्शकों को भीतर तक उद्वेलित करता है। उनके अनुसार, एक अच्छा नाटक वही होता है, जिसे दर्शक बार-बार देखना, समझना और फिर लौटकर देखना चाहे। जो नाटक स्मृति से विलुप्त न हो, वही वास्तव में अच्छा नाटक होता है। ‘उम्मीद’ में प्रत्येक दृश्य के अंत में एक स्पष्ट छवि उभरकर सामने आती है। उन्होंने कहा कि नाटक का जन्म नाटककार के मन में होता है, जबकि निर्देशक पाठ को खोलते हुए या उसका विश्लेषण करते हुए उसे मंच पर विस्तार देता है।
