बिलासपुर, अविनाश कुमार : टाइगर रिजर्व में छोड़ी गई बाघिन के गले से आठ महीने बाद रेडियो कालर निकाल दिया गया है। अब वन प्रबंधन की 24 घंटे निगरानी नहीं रहेगी। दरअसल बाघिन के लिए एटीआर का जंगल नया था। इसे देखते हुए ही प्रबंधन ने रेडियो कालर लगाकर छोड़ा था। अब इसकी आवश्यकता नहीं है। आठ महीनों में बाघिन टाइगर रिजर्व को अपना चुकी है।
बाघिन को बीते वर्ष काला मंजन गांव के नजदीक जंगल से था पकड़ा
बाघिन को बीते वर्ष मार्च में सूरजपुर के उड़गी ब्लाक के काला मंजन गांव के नजदीक जंगल से पकड़ा था। ट्रैंक्यूलाइजर गन लगने के बाद जैसे ही बाघिन बेहोश हुई, उसे पिंजरे में डाल दिया गया और सीधे जंगल सफारी के लिए रवाना कर दिया गया। जंगल सफारी लेकर जाने का पहला उद्देश्य बाघिन का उपचार करना था। जब वह पूरी तरह स्वस्थ हुई जो अचानकमार टाइगर रिजर्व के जंगल में छोड़ने का निर्णय लिया गया।
29 अप्रैल को जब बाघिन को छोड़ा गया, तब रेडियो कालर लगाया गया, जिससे उसके पल-पल की गतिविधियों की जानकारी अफसरों को मिलती रहती थी। आठ महीने से एक टीम बाघिन की निगरानी कर रही थी। इस दौरान यह देखा जा रहा था कि वह कहां है। शिकार करने में सक्षम है या नहीं। सबसे महत्वपूर्ण बाघिन को टाइगर रिजर्व का जंगल भा रहा है या नहीं। इतने लंबे अंतराल के बाद अब प्रबंधन ने महसूस किया है कि बाघिन ने अचानकमार को अपना रहवास बना लिया है और वह शिकार भी कर रही है। इसलिए अब उसकी 24 घंटे निगरानी करने की आवश्यकता नहीं है।
टाइगर रिजर्व प्रबंधन की ओर से इसकी जानकारी वाइल्ड लाइफ पीसीसीएफ को भेजी गई। इसके साथ ही उनसे रेडियो कालर हटाने की अनुमति मांगी गई। उनकी सहमति के बाद सोमवार को गले से रेडियो कालर निकाल दिया गया है। इसके लिए दोबारा रेस्क्यू करने की आवश्यकता भी नहीं पड़ी। जिस कंपनी ने इसे लगाया था, उसकी मदद से रिमोट के जरिए आटोमेटिक रेडियो कालर से निकलवाया गया।
दो लोगो को कर चुकी है घायल
बाघिन को रेस्क्यू करने की नौबत इसलिए आई क्योंकि, वह गांव के दो ग्रामीणों को घायल कर दी थी। बाद में दोनों ग्रामीणों की मौत हो गई। इससे पहले कि वह और दूसरे ग्रामीणों को अपना निशाना बनाए। किसी और को क्षति न पहुंचाए, इसलिए रेस्क्यू करने का निर्णय लिया गया। रेस्क्यू टीम में कानन पेंडारी के वन्य प्राणी चिकित्सक पीके चंदन भी सम्मिलित थे।
हर घंटे आता था मोबाइल पर लोकेशन
बाघिन की सुरक्षा व निगरानी के लिए ही रेडियो कालर लगाया गया था। इसके द्वारा बाघिन जंगल के अंदर जिस जगह पर रहेगी हर घंटे अफसरों के मोबाइल पर लोकेशन आता था। इसका एक लाभ यह भी था कि यदि बाघिन गांव की तरफ पहुंचती है तो ग्रामीणों को सचेत किया जा सकता है।