BPAL इलाज बना बेहतर विकल्प, कम लागत में बेहतर स्वास्थ्य परिणाम

BPaL-Treatment

रिपब्लिक समाचार, न्यूज़ डेस्क : भारत में दवा-प्रतिरोधी तपेदिक (एमडीआर/आरआर-टीबी) के इलाज को लेकर आईसीएमआर के एक अध्ययन ने अहम निष्कर्ष दिए हैं। इंडियन जर्नल ऑफ मेडिकल रिसर्च में प्रकाशित आर्थिक मूल्यांकन के अनुसार, वर्तमान में उपयोग किए जा रहे दीर्घकालिक उपचारों की तुलना में छह महीने की पूरी तरह से मौखिक उपचार पद्धतियां कम लागत वाली होने के साथ बेहतर स्वास्थ्य परिणाम भी देती हैं।

आईसीएमआर-एनआईआरटी ने किया अध्ययन

यह अध्ययन आईसीएमआर-राष्ट्रीय तपेदिक अनुसंधान संस्थान (आईसीएमआर-एनआईआरटी) द्वारा किया गया। इसमें राष्ट्रीय तपेदिक उन्मूलन कार्यक्रम (एनटीईपी) के तहत उपयोग किए जा रहे बेडाक्विलाइन युक्त कम अवधि (9-11 महीने) और लंबी अवधि (18-20 महीने) के मानक उपचार रेजिमेन की तुलना बीपीएएल (बेडाक्विलाइन, प्रेटोमैनिड और लाइनज़ोलिड) तथा बीपीएएलएम (मोक्सीफ्लोक्सासिन के साथ) जैसे बेडाक्विलाइन-आधारित छह महीने के उपचार से की गई।

बीपीएएल पद्धति लागत-बचत और अधिक प्रभावी

विश्लेषण में पाया गया कि बीपीएएल उपचार पद्धति अधिक प्रभावी और लागत-बचत वाली है। प्रत्येक अतिरिक्त गुणवत्ता-समायोजित जीवन वर्ष (क्यूएएलवाई) पर स्वास्थ्य प्रणाली को मानक उपचार की तुलना में प्रति मरीज 379 रुपए कम खर्च करने पड़ते हैं। यह कम लागत में बेहतर स्वास्थ्य परिणामों का संकेत देता है।

वहीं, बीपीएएलएम पद्धति भी अत्यधिक लागत-प्रभावी पाई गई। इसमें प्रति अतिरिक्त क्यूएएलवाई हासिल करने पर प्रति मरीज केवल 37 रुपए का अतिरिक्त व्यय होता है। दोनों पद्धतियों में दवाओं, अस्पताल जाने और अनुवर्ती देखभाल सहित कुल स्वास्थ्य खर्च कम या तुलनीय पाया गया।

लंबी अवधि के उपचार में कई चुनौतियां

एमडीआर/आरआर-टीबी के उपचार में लंबी अवधि, दुष्प्रभाव और अधिक लागत जैसी चुनौतियां सामने आती हैं। कम अवधि की मौखिक दवाइयों से मरीजों की उपचार के प्रति प्रतिबद्धता बेहतर हो सकती है, रुग्णता कम हो सकती है और वे सामान्य जीवन में जल्दी लौट सकते हैं। इससे स्वास्थ्य प्रणाली पर बोझ भी कम पड़ सकता है।

टीबी उन्मूलन के लक्ष्य को मिलेगा बल

उपचार की अवधि को 9-18 महीने या उससे अधिक से घटाकर छह महीने करने से संसाधनों के बेहतर उपयोग की संभावना बढ़ती है। यह पहल देश के तपेदिक उन्मूलन लक्ष्यों के अनुरूप है और राष्ट्रीय प्राथमिकताओं को गति दे सकती है।

अध्ययन के निष्कर्ष बताते हैं कि बीपीएएल-आधारित उपचार पद्धतियां लागत-बचत करने वाली या अत्यधिक लागत-प्रभावी हैं। इन्हें एनटीईपी के तहत कार्यक्रमगत रूप से अपनाने पर विचार किया जा सकता है, जिससे भारत में दवा-प्रतिरोधी तपेदिक के खिलाफ प्रतिक्रिया को और मजबूत किया जा सके।

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