नई दिल्ली, न्यूज़ डेस्क : चीन के तियानजिन शहर में आयोजित SCO समिट के बाद ऐसी उम्मीद की जा रही थी कि भारत और चीन के रिश्ते अब सुधरने की कगार पर पहुंच रहे हैं। हालांकि, चीन ने अपनी पीठ में छुरा घोंपने की पुरानी आदत को एक बार फिर तवज्जो दी, जिसने उस पर भरोसा ना कर पाने के कारणों को सही साबित कर दिया।
चीन ने अरुणाचल प्रदेश पर अपने दावे को एक बार फिर दोहराकर दुनिया को ये दिखा दिया कि उस पर भरोसा करना सबसे बड़ी गलती हो सकती है। चीनी प्रवक्ता ने तो ये तक कह दिया कि उसने कभी अरुणाचल प्रदेश को मान्यता नहीं दी है।
आपको बता दें कि SCO समिट के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच दो द्विपक्षीय बैठकें हुईं, जिनमें व्यापार, सीमा विवाद, और आतंकवाद जैसे मुद्दों पर चर्चा हुई थी। बताया जा रहा था कि 2020 के गलवान संघर्ष के बाद भारत और चीन के बीच तनाव कम करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम था। ऐसे में अरुणाचल प्रदेश के मुद्दे को एक बार फिर दोहराना चीन के लिए घाटे का सौदा हो सकता है।
अरुणाचल प्रदेश चीन को क्यों चाहिए ?
अरुणाचल प्रदेश भारत के नॉर्थ-ईस्ट का सबसे बड़ा राज्य है। इसकी इंटरनेशनल बॉर्डर तिब्बत, म्यांमार और भूटान से लगती है। चीन पूरे अरुणाचल प्रदेश को “साउथ तिब्बत” कहता है। बीजिंग इस इलाके को चीनी भाषा में “जंगनान” कहता है। यहां दिक्कत लाइन ऑफ एक्चुअल कंट्रोल को लेकर है, जो भारत और चीन के इलाके को अलग करती है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत LAC को 3,488 किलोमीटर मानता है, जबकि चीन का कहना है कि यह लगभग 2,000 किलोमीटर है।
