Delhi Blast Case : 10 से ज्‍यादा छात्र-कर्मी अल-फलाह यूनिवर्सिटी से गायब

Al-Falah-University

नई दिल्ली, संवाददाता : Delhi Blast Case : दिल्‍ली ब्‍लास्‍ट केस के बाद चर्चा में आए अल-फलाह यूनिवर्सिटी की चल रही जांच के बीच यहां के 10 से ज्‍यादा लोग गायब बताए जा रहे हैं। इनमें यहां काम करनेवाले भी शामिल हैं और पढ़ाई करने वाले छात्र भी. बताया जा रहा है कि गायब 10 से ज्‍यादा लोगों में 3 कश्‍मीरी भी शामिल हैं। गायब हुए लोगों के फोन स्विच ऑफ बताए जा रहे हैं। दिल्‍ली ब्‍लास्‍ट केस में जम्मू कश्मीर पुलिस और फरीदाबाद पुलिस की चल रही कार्रवाई के बाद ये लोग गायब बताए जा रहे हैं। दोनों ही राज्‍यों (जम्‍मू कश्‍मीर और हरियाणा) की पुलिस इनकी तलाश में लगी है।

टेरर मॉडयूल में शामिल होने का संदेह
पुलिस की ओर से बताया गया है कि जो लोग यूनिवर्सिटी से गायब हैं, उन लोगों के फोन स्विच ऑफ हैं. जांच एजेंसियां इन लोगों के बारे में पता लगाना लगाने की कोशिश कर रही हैं। सूत्रों के अनुसार, एजेंसियों ने अल फलाह यूनिवर्सिटी से सभी गायब लोगों की लिस्ट ली है. संदेह है कि इनमें से कई लोग टेरर मॉड्यूल में शामिल हो सकते हैं।

फाउंडर जावेद सिद्दीकी ईडी की हिरासत में

अल फलाह यूनिवर्सिटी के फाउंडर जावेद अहमद सिद्दीकी भी ED की हिरासत में हैं. प्रवर्तन निदेशालय (ED) ने सिद्दीकी को 13 दिनों की हिरासत में लिया है। यूनिवर्सिटी के फाउंडर जावेद को मंगलवार को दिल्ली में लाल किले के पास हुए आतंकी हमले से जुड़े मनी लॉन्ड्रिंग के मामले में गिरफ्तार किया गया।

ED की पूछताछ से कई अहम खुलासे होने की संभावनाएं हैं. ईडी ने जावेद अहमद सिद्दीकी को मंगलवार देर रात दिल्ली की साकेत कोर्ट में पेश किया था, जहां अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश शीतल चौधरी प्रधान ने आधी रात करीब एक बजे जावेद अहमद सिद्दीकी को ईडी रिमांड पर भेजने का आदेश पारित किया।

करोड़ों रुपये की हेरफेर का संदेह
रिमांड नोट के अनुसार, इस संस्था ने कथित तौर पर पिछले कई सालों में छात्रों को भ्रमित कर न सिर्फ एडमिशन लिए, बल्कि भारी भरकम रकम भी वसूली है। आईटीआर के विश्लेषण से यह भी पता चला है कि वित्तीय वर्ष 2014-15 से 2024-25 तक यूनिवर्सिटी ने करोड़ों रुपये की आय दिखाई।

ईडी की जांच में सामने आया-

ईडी की जांच में सामने आया कि वित्तीय वर्ष 2014-15 और 2015-16 में क्रमश: 30.89 करोड़ और 29.48 करोड़ रुपए को स्वैच्छिक योगदान यानी वॉलंटरी कंट्रीब्यूशन बताया गया, लेकिन 2016-17 के बाद इनकम को सीधे मेन ऑब्जेक्ट या एजुकेशनल रेवेन्यू के रूप में दिखाया जाने लगा।

जांच में पता चला कि वित्तीय वर्ष 2018-19 में 24.21 करोड़ रुपए और वित्तीय वर्ष 2024-25 में 80.01 करोड़ रुपए की आय दर्ज की गई. कुल मिलाकर कथित तौर पर फर्जी मान्यता के नाम पर लगभग 415.10 करोड़ रुपए की रकम हासिल की गई।

एजेंसियों का दावा है कि यूनिवर्सिटी ने झूठे दावों और भ्रामक प्रैक्टिस के जरिए छात्रों के विश्वास, भविष्य और उम्मीदों के साथ खिलवाड़ किया। इस मामले में ईडी की जांच दिल्ली पुलिस की एफआईआर से शुरू हुई, जिसके आधार पर अब मनी लॉन्ड्रिंग के एंगल से भी पड़ताल जारी है।

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