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धार, संवाददाता : Dhar News : मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेश के तहत गत शुक्रवार को पहली बार खसरा संख्या 612 पर नमाज पढ़े जाने के बाद होने के बाद अब सबकी निगाहें पांच अगस्त को होने वाली अंतिम सुनवाई पर टिकी हैं।

इस सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट में केवल अंतरिम याचिका पर ही बहस नहीं होगी, बल्कि यह भी स्पष्ट हो सकता है कि नमाज की अंतरिम व्यवस्था आगे भी जारी रहेगी या न्यायालय इस संबंध में कोई नया निर्णय पारित करेगा। यही कारण है कि प्रशासन, मंदिर पक्ष और मस्जिद पक्ष, तीनों को अब अंतिम सुनवाई का इंतजार है।

सुप्रीम कोर्ट वर्तमान व्यवस्था को ही जारी रखने का आदेश दे सकता है

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद गत शुक्रवार को भोजशाला के पीछे स्थित खसरा संख्या 612 की जमीन पर शांतिपूर्वक नमाज अदा की गई। इसके साथ ही अब सवाल खड़ा हो गया है कि यदि पांच अगस्त की अंतिम सुनवाई पूरी होने के बाद न्यायालय अपना फैसला सुरक्षित रखता है, तो आगे क्या होगा? कानूनी जानकार भी इस पर मंथन कर रहे हैं कि ऐसी स्थिति में सुप्रीम कोर्ट वर्तमान व्यवस्था को ही जारी रखने का आदेश दे सकता है।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ वाग्देवी का मंदिर मानने का निर्णय दे चुकी है

बता दें कि लंबे कानूनी विवाद के बाद ऐतिहासिक भोजशाला को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ वाग्देवी का मंदिर मानने का निर्णय दे चुकी है। इसको चुनौती देते हुए मस्जिद पक्ष की ओर से दायर अपील पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतिम सुनवाई के लिए पांच अगस्त की तिथि तय कर तब तक के लिए प्रत्येक शुक्रवार को नमाज की अंतरिम व्यवस्था करने के निर्देश धार प्रशासन को दिए थे।

मंदिर पक्ष उठा सकता है आपत्ति

भोजशाला मुक्ति यज्ञ के संयोजक गोपाल शर्मा पहले ही खसरा संख्या 612 पर नमाज की व्यवस्था पर असहमति जता चुके हैं। भोजशाला के पीछे यह स्थान होने के कारण कानून व्यवस्था का संदर्भ देकर पांच अगस्त की सुनवाई के दौरान मंदिर पक्ष इस मुद्दे को उठाकर अंतरिम व्यवस्था पर अपनी आपत्ति अदालत के समक्ष रख सकता है।

मस्जिद पक्ष भी कर रहा पक्ष रखने की तैयारी

दूसरी ओर, मस्जिद पक्ष भी अंतिम सुनवाई के लिए अपना पक्ष मजबूती से रखने की तैयारी में जुटा हुआ है। सूत्रों के अनुसार, मुस्लिम पर्सनल ला से जुड़े विशेषज्ञों और वरिष्ठ अधिवक्ताओं की सलाह के आधार पर कानूनी रणनीति तैयार की जा रही है, ताकि अंतरिम याचिका और मूल विवाद दोनों पर अपना पक्ष प्रभावी ढंग से रखा जा सके।