मुरादाबाद, संवाददाता : when mud turned into sugar candy in front of the British : मुरादाबाद के लालबाग में स्थित सिद्धपीठ काली मंदिर और नौ देवी मंदिर न केवल वास्तुकला के नमूने हैं, बल्कि ये सदियों पुरानी आस्था, चमत्कारों और संतों की तपस्या के जीवंत प्रमाण भी हैं। आइए जानते हैं इन दो प्राचीन सिद्धपीठों की अनकही गाथाओं को।
जब मिट्टी बनी मिश्री और डिग गया ब्रिटिश शासन
करीब 500 वर्ष पुराने काली मंदिर का इतिहास शौर्य और अध्यात्म का अनूठा संगम है। इस पीठ की नींव महंत मिश्री गिरि महाराज ने रखी थी। उस दौर में यह मंदिर एक ऊंचे टीले पर स्थित एक छोटा सा काली मठ था।
मिट्टी का चमत्कार
जनश्रुतियों के अनुसार, ब्रिटिश काल में औपनिवेशिक सरकार की नजर इस मंदिर की बेशकीमती भूमि पर पड़ गई थी। जब अधिकारियों ने जमीन पर दावा ठोका, तब महंत मिश्री गिरि महाराज ने अपनी योगशक्ति का परिचय दिया। उन्होंने जमीन से मुट्ठी भर मिट्टी उठाकर हवा में उछाली और घोषणा की कि जहां तक यह धूल गिरेगी, वह भूमि देवी की मानी जाएगी।
कहा जाता है कि वह मिट्टी हवा में ही ‘मिश्री’ (चीनी के दानों) में बदल गई। इस अलौकिक दृश्य को देखकर ब्रिटिश अधिकारियों ने न केवल अपना दावा वापस ले लिया, बल्कि वे भी नतमस्तक हो गए। तब से इस स्थान की महिमा पूरे क्षेत्र में फैल गई। ब्रह्मलीन महंत ओंकारेश्वर गिरि से लेकर यश गिरि महाराज तक, संतों की एक लंबी श्रृंखला ने यहां तपस्या कर इसे जागृत बनाए रखा।
धरा चीरकर प्रकट हुई मां की माता
लालबाग स्थित दूसरा प्रमुख केंद्र ‘नौ देवी मंदिर’ है, जिसका इतिहास लगभग 400 वर्ष पुराना है। इस मंदिर की सबसे बड़ी विशेषता यहां की ‘स्वयंभू’ प्रतिमा है।
नौ स्वरूपों का मिलन
माना जाता है कि सदियों पहले यहां माता की मूर्ति स्वतः ही भूमि के भीतर से प्रकट हुई थी। इस विग्रह की अद्भुत बात यह है कि इसमें नौ देवियों का संयुक्त स्वरूप समाहित है। महंत ओंकारेश्वर गिरि और वेदांत गिरि महाराज जैसे सिद्ध संतों की साधना ने इस स्थान को एक ऊर्जा केंद्र में बदल दिया है। यहाँ भक्तों का विश्वास है कि माता के स्वयंभू दर्शन मात्र से ही सारी मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।
जूना अखाड़ा और मंदिरों का प्रबंधन
इन दोनों पवित्र स्थलों का स्वामित्व और संचालन श्री पंचदशनाम जूना अखाड़ा के पास है। 1860 से पंजीकृत यह संस्था विश्वभर में लगभग 50,000 मंदिरों का प्रबंधन करती है।
धर्म की शिक्षा और उत्तराधिकार
अखाड़े की व्यवस्था के अनुसार, नौ वर्ष की आयु में बच्चों को दत्तक लेकर उन्हें गुरुकुल और आधुनिक शिक्षा दोनों दी जाती है। शिक्षा पूरी होने के बाद, किसी भी संत को उनकी योग्यता के आधार पर जिम्मेदारी सौंपी जाती है। हाल ही में इन मंदिरों के प्रबंधन और पूजा-पाठ के लिए कानपुर के प्रसिद्ध आनंदेश्वर महादेव मठ से जुड़े संतों को नियुक्त किया गया है, जो इस प्राचीन विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं।
धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से
मुरादाबाद के ये मंदिर न केवल स्थानीय निवासियों बल्कि दूर-दराज से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए भी शांति और शक्ति का केंद्र हैं। खसरा-खतौनी के दस्तावेजों में भी यह स्थान जूना अखाड़े की संपत्ति के रूप में दर्ज है, जो इसके ऐतिहासिक और कानूनी महत्व को पुख्ता करता है।
