अल्मोड़ा , संवाददाता : मंजिल उन्ही को मिलती है, जिनके सपनों में जान होती है, पंखों से कुछ नहीं होता, हौसलों से उड़ान होती है। यह कविता की पंक्ति नवाचारी रवि टम्टा में सटीक बैठती है। बचपन में ही हवा में उड़ान भरने का सपना देखने वाले रवि ने महज 20 वर्ष की उम्र में अपने गांव में ही हेलीकॉप्टर तैयार कर दिया था। भले ही वह उस समय नहीं उड़ पाए लेकिन आज उन्होंने उड़ने वाली कार बनाकर यह सपना भी पूरा कर लिया है। वर्ष 2014 में नवाचारी रवि टम्टा ने धौलादेवी ब्लॉक के काफलीखान में हेलीकॉप्टर बना दिया था। इसे बनाने में उन्हें दो वर्ष का समय लगा। जब हेलीकॉप्टर हवा में उड़ने को तैयार था। लेकिन इसके लिए उन्हें कुछ औपचारिकता करनी थी। उन्होंने इसे उड़ाने के लिए प्रशासन से अनुमति मांगी, लेकिन उस समय उड़ान की अनुमति नहीं मिली। 12 वर्ष पहले अधूरा रह गया था उड़ान का सपना, वह भी हुआ पूरा प्रशासन का तर्क था कि किसी दुर्घटना की स्थिति में जिम्मेदारी तय करना कठिन होगा। अनुमति नहीं मिलने के कारण उनका यह हेलीकॉप्टर आज भी गांव में अवशेष के रूप में मौजूद है। यही घटना आगे चलकर उड़ने वाली कार विकसित करने की उनकी सबसे बड़ी प्रेरणा बनी। उन्होंने अपने सपनों को थमने नहीं दिया। उसी जुनून ने उन्हें स्वदेशी पर्सनल फ्लाइंग व्हीकल ”हपिडा स्काईनेक्स” विकसित करने की प्रेरणा दी। नैनीताल से की स्नातक की पढ़ाई रवि टम्टा ने जूनियर हाईस्कूल तक की शिक्षा सनरगोड़ से प्राप्त की। इसके बाद उन्होंने चेतराम साह ठुलघरिया इंटर कॉलेज, नैनीताल से इंटरमीडिएट उत्तीर्ण किया और नैनीताल परिसर से बीए की डिग्री हासिल की। उनकी पत्नी सुनीता दुनाड़ गांव से वर्ष 2019 में बीडीसी सदस्य रह चुकी है। रवि की एक पांच वर्ष की बेटी है। चीड़ की पिरुल से रोजगार और वन संरक्षण की नई पहल उड़ने वाली तकनीक के साथ-साथ रवि टम्टा पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी नवाचार कर रहे हैं। उन्होंने हपिडा पाइनपीट मशीन विकसित की है, जो चीड़ की सूखी पत्तियों को प्रोसेस कर पाइनपीट तैयार करती है। इसका उपयोग पौधशालाओं, बागवानी और मशरूम उत्पादन में किया जा रहा है। इसी मशीन से बायो पेलेट्स भी बनाए जाते हैं, जिनका इस्तेमाल ऊर्जा उत्पादन में किया जा सकता है। इस पहल से ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और युवाओं के लिए स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर सृजित हो रहे हैं। 10 जिलों में संचालित किया जा रहा मॉडल इस नवाचार को जापान इंटरनेशनल कोपरेशन एजेंसी का सहयोग प्राप्त है और इसका मॉडल उत्तराखंड के 10 जिलों में संचालित किया जा रहा है। वनाग्नि की समस्या से जूझ रहे प्रदेश में यह पहल पर्यावरण संरक्षण के साथ ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी नई दिशा देने की क्षमता रखती है। Post navigation राशन दुकान से 1225 क्विंटल सरकारी चावल गायब, 50 लाख का गबन दिल्ली-NCR में बूंदाबांदी शुरू, 5 घंटे के भीतर 15 राज्यों में भारी बारिश का अलर्ट