नई दिल्ली, संवाददाता : जेएनयू परिसर में वामपंथी गुटों द्वारा हुए विरोध प्रदर्शन के दौरान एक बार फिर वही पुरानी देशविरोधी मानसिकता सामने आई, जो समय-समय पर विश्वविद्यालय की शैक्षणिक गरिमा को ठेस पहुँचाती रही है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राष्ट्रविरोधी तथा हिंसात्मक गतिविधियों में संलिप्त उमर ख़ालिद और शरजील इमाम की ज़मानत याचिकाएँ ख़ारिज किए जाने के बाद, कुछ वामपंथी और तथाकथित ‘टुकड़े-टुकड़े गैंग’ से जुड़े तत्वों ने न्यायिक निर्णय का सम्मान करने के बजाय खुलेआम उग्र नारेबाज़ी की।
संवैधानिक संस्थाओं को चुनौती देने वाले नारे लगाए गए
इस दौरान न केवल संवैधानिक संस्थाओं को चुनौती देने वाले नारे लगाए गए,अपितु भारत के प्रधानमंत्री, गृहमंत्री, आरएसएस और अभाविप के विरुद्ध “कब्र खोदने” जैसे हिंसा को उकसाने वाले अमर्यादित नारे भी सुनने को मिले। यह कोई अचानक हुआ घटनाक्रम नहीं है, बल्कि 2016 से लेकर 2020 और उसके बाद तक जेएनयू में बार-बार सामने आती रही उसी विचारधारा की निरंतरता है, जिसने पहले भी आतंकवादियों के समर्थन, भारत की एकता-अखंडता पर हमले और संवैधानिक व्यवस्था को बदनाम करने का प्रयास किया है।
अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद दिल्ली का यह स्पष्ट मत है कि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा लिया गया निर्णय भारत की स्वतंत्र, निष्पक्ष और सशक्त न्यायिक परंपरा का प्रमाण है। न्यायपालिका ने तथ्यों, साक्ष्यों और संविधान के दायरे में रहकर निर्णय दिया है, न कि किसी भी प्रकार के बाहरी दबाव, अंतरराष्ट्रीय प्रोपेगेंडा या सड़कों पर की जाने वाली नारेबाज़ी के आधार पर। इसके बावजूद जिस प्रकार जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के वामपंथी नेतृत्व द्वारा इस निर्णय के विरोध में उग्र और हिंसक भाषा का प्रयोग किया गया, वह न केवल न्यायालय की अवमानना की मानसिकता को दर्शाता है, बल्कि लोकतांत्रिक असहमति की आड़ में अराजकता फैलाने का प्रयास भी है। अभाविप मानती है कि असहमति का अधिकार सबको है, लेकिन हिंसा, घृणा और राष्ट्र के निर्वाचित नेतृत्व के खिलाफ कब्र खोदने जैसे नारे किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकते।
