देहरादून, संवाददाता : केंद्रीय पृथ्वी विज्ञान राज्य मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने देहरादून में ‘आपदा प्रबंधन पर विश्व शिखर सम्मेलन’ में भारत की मजबूत आपदा तैयारियों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि उत्तराखंड में सुरकंडा देवी, मुक्तेश्वर और लैंसडाउन में तीन मौसम रडार पहले ही स्थापित किए जा चुके हैं और हरिद्वार, पंतनगर और औली में तीन और रडार जल्द ही चालू किए जाएंगे। इस प्रकार क्षेत्र के लिए वास्तविक समय पूर्वानुमान क्षमता और मजबूत होगी। इस दौरान, केंद्रीय मंत्री ने रडार नेटवर्क के विस्तार और नए हिमालयी अध्ययन की घोषणा की। जितेंद्र सिंह ने रविवार को आपदा प्रबंधन पर विश्व शिखर सम्मेलन को संबोधित करते हुए उत्तराखंड को इसके जीवंत अनुभवों, भौगोलिक संवेदनशीलता और हिमालयी इकोसिस्टम को देखते हुए आपदा लचीलापन पर वैश्विक चर्चा के लिए सबसे प्राकृतिक और उपयुक्त स्थान बताया। एक दशक में जल-मौसम संबंधी खतरों में तेजी से वृद्धि हुई केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने कहा कि उत्तराखंड में पिछले एक दशक में जल-मौसम संबंधी खतरों में तेजी से वृद्धि हुई है। इसमें 2013 केदारनाथ बादल फटने और 2021 की चमोली आपदा निर्णायक मोड़ हैं। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक विश्लेषण जलवायु परिवर्तन के प्रभावों, तेजी से पीछे हटते ग्लेशियर, ग्लेशियर-झील के फटने के जोखिम, नाजुक हिमालयी पर्वत प्रणाली, वनों की कटाई और मानव निर्मित अतिक्रमण के संयोजन की ओर इशारा करते हैं। यह प्राकृतिक जल निकासी मार्गों को बाधित करते हैं। उन्होंने कहा कि “बादल फटना” और “अचानक बाढ़” जैसे शब्द, जो पच्चीस साल पहले शायद ही कभी इस्तेमाल किए जाते थे, अब इस तरह की घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति के कारण रोजमर्रा की शब्दावली का हिस्सा बन गए हैं। जितेंद्र सिंह ने कहा कि उत्तराखंड में पिछले एक दशक में जल-मौसम संबंधी खतरों में तेजी से वृद्धि हुई है। इसमें 2013 केदारनाथ बादल फटने और 2021 की चमोली आपदा निर्णायक मोड़ हैं। उन्होंने कहा कि वैज्ञानिक विश्लेषण जलवायु परिवर्तन के प्रभावों, तेजी से पीछे हटते ग्लेशियर, ग्लेशियर-झील के फटने के जोखिम, नाजुक हिमालयी पर्वत प्रणाली, वनों की कटाई और मानव निर्मित अतिक्रमण के संयोजन की ओर इशारा करते हैं। यह प्राकृतिक जल निकासी मार्गों को बाधित करते हैं। केंद्रीय मंत्री ने कहा कि “बादल फटना” और “अचानक बाढ़” जैसे शब्द, जो पच्चीस साल पहले शायद ही कभी इस्तेमाल किए जाते थे, अब इस तरह की घटनाओं की बढ़ती आवृत्ति के कारण रोजमर्रा की शब्दावली का हिस्सा बन गए हैं। भारत सरकार ने मौसम विज्ञान और आपदा-निगरानी बुनियादी ढांचे का किया विस्तार डॉ. जितेंद्र सिंह ने विस्तार से बताया कि भारत सरकार ने पिछले दस वर्षों में उत्तराखंड के मौसम विज्ञान और आपदा-निगरानी बुनियादी ढांचे का काफी विस्तार किया है। उन्होंने बताया कि पूर्व चेतावनी प्रसार में सुधार के लिए 33 मौसम विज्ञान वेधशालाएं, रेडियो-सोंडे और रेडियो-विंड सिस्टम का एक नेटवर्क, 142 स्वचालित मौसम स्टेशन, 107 वर्षा गेज, जिला स्तर और ब्लॉक-स्तरीय वर्षा निगरानी प्रणाली और किसानों के लिए व्यापक ऐप-आधारित आउटरीच कार्यक्रम स्थापित किए गए हैं। उन्होंने कहा कि सुरकंडा देवी, मुक्तेश्वर और लैंसडाउन में तीन मौसम रडार पहले ही स्थापित किए जा चुके हैं और हरिद्वार, पंतनगर और औली में जल्द ही तीन और रडार चालू किए जाएंगे। इससे क्षेत्र के लिए वास्तविक समय पूर्वानुमान क्षमता और मजबूत होगी। केंद्रीय मंत्री ने बताया कि भारत ने अचानक बादल फटने की घटनाओं को उत्पन्न करने वाली परिस्थितियों का विश्लेषण करने के लिए एक विशेष हिमालयी जलवायु अध्ययन कार्यक्रम शुरू किया है। इसका उद्देश्य संवेदनशील जिलों के लिए पूर्वानुमान संकेतक तैयार करना है। उन्होंने कहा कि तीन घंटे का पूर्वानुमान प्रदान करने वाली “नाउकास्ट” प्रणाली प्रमुख महानगरों में सफलतापूर्वक उपयोग की गई है। अब इसे प्रशासन और समुदायों को समय पर अलर्ट प्रदान करने के लिए पूरे उत्तराखंड में विस्तारित की जा रही है। उन्होंने उन्नत वन अग्नि मौसम सेवाओं को विकसित करने में एनडीएमए, पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय और कई वैज्ञानिक संस्थानों के समन्वित प्रयासों को भी रेखांकित किया और इसे जलवायु लचीलेपन के लिए एक संपूर्ण सरकारी और संपूर्ण विज्ञान मॉडल बताया। Post navigation Cyclone Ditvah पड़ा कमजोर, उत्तर तमिलनाडु में भारी वर्षा का खतरा टला Indian Air Force ने श्रीलंका के 57 सैनिकों को किया एयरलिफ्ट