मुरादाबाद, संवाददता : सिद्धपीठ काली मंदिर में अब माता रानी को बताशे का भोग नहीं लगाया जाएगा। बताशे की शुद्धता पर सवाल उठाते हुए श्रीपंचदशनाम जूना अखाड़ा ने नई व्यवस्था लागू कर दी है, जिसके तहत मिश्री, पंचमेवा, काले चने, हलुवा और पेड़ा से ही भोग लगाया जाएगा।
इस निर्णय को लागू करने के लिए मंदिर परिसर के आसपास प्रसाद, फूल और शृंगार सामग्री बेचने वाले दुकानदारों के साथ बैठक भी की गई, जिसमें सभी ने बताशे का उपयोग बंद कर मिश्री, पंचमेवा व पेड़ा रखने पर सहमति जताई।
नई व्यवस्था के अनुसार सिद्धपीठ काली माता मंदिर और सिद्धपीठ नौ देवी मंदिर में प्रतिदिन भोग प्रसाद मंदिर परिसर में ही तैयार किया जाएगा। इसमें मखाने की खीर, हलवा और काले चने शामिल होंगे। विशेष रूप से शुक्ल पक्ष की अष्टमी पर हलवा-चना का ही भोग लगाया जाएगा।
वहीं मंदिर के बाहर दुकानदार श्रद्धालुओं को मिश्री, पंचमेवा और पेड़ा ही उपलब्ध कराएंगे। जूना अखाड़ा के अनुसार देशभर में उसके अधीन लगभग 5000 मंदिर और 61 मठ आते हैं, जहां पहले से कई स्थानों पर बताशे पर रोक थी, लेकिन अब इसे सभी जगह अनिवार्य किया जा चुका है।
इसी व्यवस्था के तहत अब श्री काली और सिद्धपीठ नौ देवी मंदिर लालबाग में भोग लगेगा। यह नियम विदेशों में संचालित मंदिरों-जैसे थाईलैंड, नेपाल, अमेरिका और इंग्लैंड में भी लागू किया जा चुका है।
अखाड़ा के अंतरराष्ट्रीय प्रवक्ता नारायण गिरी महाराज ने बताया कि भोग के लिहाज से बताशे को शुद्ध नहीं माना गया है और इसकी गुणवत्ता को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।
मिश्री गिरि की परंपरा से जुड़ा भोग का स्वरूप
अखाड़ा के साधुओं ने बताया कि श्रीकाली मंदिर महंत मिश्री गिरि का टीला के नाम से प्रसिद्ध है। बताते हैं कि मिश्री गिरि महाराज की मठ के प्रति साधना और शक्तिपीठ के आगे अंग्रेज भी घुटने टेक चुके थे। अंग्रेजी हुकुमत जब थी तो वह मिश्री गिरि का टीला कब्जाना चाहते थे।
तब मिश्री गिरी महाराज ने मिट्टी हाथ में लेकर उछाली थी और कहा था कि जहां तक यह मिट्टी जाएगी वह मठ की जमीन होगी। मिट्टी दूर तक गई और जहां-जहां गिरी वह मिट्टी मिश्री में बदल गई। इस शक्ति को देखकर अंग्रेजों ने मंदिर की सम्पत्ति से अपना दावा छोड़ दिया था।
सबसे पहले मिश्री गिरि ने ही यहां मां काली के मठ की सेवा की थी। इसी परंपरा के आधार पर मिश्री और पंचमेवा का भोग सर्वोत्तम माना गया है। दुकानदारों ने भी इस परंपरा का सम्मान करते हुए नई व्यवस्था में सहयोग का आश्वासन दिया है।
मंदिरों में महंतों के फेरबदल, संभाला कार्यभार
श्रीकाली मंदिर में हाल ही में फिर जूना अखाड़ा की ओर से बदलाव किए गए हैं। आठ दिन पहले नियुक्त कार्यवाहक महंत को महाकाल गिरि महाराज को कानपुर के आनंदेश्वर मठ मंदिर स्थानांतरित कर दिया गया है। उनके स्थान पर हितेश्वर गिरि महाराज ने कार्यभार संभाल लिया है।
वहीं सिद्धपीठ नौ देवी मंदिर में हितेश्वर गिरि महाराज के स्थान पर महादेवानंद गिरि महाराज को कार्यवाहक महंत नियुक्त किया गया है।
श्रीपंचदशनाम जूना अखाड़ा के शीर्ष नेतृत्व ने यह भी स्पष्ट किया है कि अब उसके मंदिरों में स्थायी महंत नहीं होंगे। शिकायत मिलने पर महंतों को हटाकर स्थानांतरित किया जाएगा, जबकि बिना शिकायत के भी समय-समय पर दूसरे मंदिरों में जिम्मेदारी दी जाएगी, ताकि व्यवस्थाओं में पारदर्शिता बनी रहे।
30 लाख जमा कर निपटाया बिजली बिल
सिद्धपीठ काली माता मंदिर में लंबे समय से लंबित बिजली बिल का मामला भी अब सुलझा लिया गया है। जानकारी के अनुसार, सज्जन गिरि के महंत बनने के बाद वर्ष 2016 से बिजली बिल जमा नहीं किया गया था, जिसके चलते करीब 40 लाख रुपये का बकाया हो गया था।
बिजली विभाग ने धार्मिक आस्था को ध्यान में रखते हुए आपूर्ति बाधित नहीं की, लेकिन बाद में जूना अखाड़ा के प्रतिनिधिमंडल ने अधिकारियों से वार्ता की। इसके बाद 10 लाख रुपये की राहत दी गई और शेष 30 लाख रुपये का भुगतान कर दिया गया।
अखाड़ा के मीडिया प्रभारी आशुतोष कुमार ने बताया कि अब आगे से बिजली बिल समय पर जमा कराया जाएगा, ताकि इस तरह की स्थिति दोबारा न बने।
