नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क : मिस्र के वैली आफ किंग में स्थित उच्च सुरक्षा वाले शाही मकबरों के भीतर 2,000 वर्ष पुराने तमिल-ब्राह्मी शिलालेखों की पहचान की गई है। यह इसकी पुष्टि करता है कि प्राचीन तमिल व्यापारी अन्वेषण और पर्यटन के लिए मिस्र के आंतरिक भागों तक यात्रा करते थे।
स्विट्जरलैंड के लाजेन विश्वविद्यालय के प्रोफेसर स्ट्राच ने पेरिस स्थित फ्रेंच स्कूल आफ एशियन स्टडीज की प्रोफेसर शार्लोट श्मिड के साथ मिलकर रामसेस षष्टम के मकबरे सहित छह चट्टानों को काटकर बनाए गए मकबरों में तमिल-ब्राह्मी और प्राकृत में लगभग 30 शिलालेखों का दस्तावेजीकरण किया। सबसे महत्वपूर्ण खोज ‘चिकाई कोर्रान’ नाम है, जो आठ अलग-अलग स्थानों पर मिला है।
शोधकर्ताओं ने पाया कि एक शिलालेख में विशेष रूप से ‘चिकाई कोर्रान वारा कांता’ लिखा है, जिसका अनुवाद ‘चिकाई कोर्रान आया और देखा’ होता है, जो उसी परिसर में पाए गए ग्रीक पर्यटक भित्तिचित्रों की शैली से मिलता-जुलता है।
मिस्र भी जाते थे भारतीय व्यापारी
स्ट्राच ने कहा कि मिस्र में तमिल उपस्थिति के पूर्व प्रमाण केवल बेरेनिके जैसे बंदरगाह शहरों तक ही सीमित थे, लेकिन ये शिलालेख साबित करते हैं कि भारतीय व्यापारी केवल अस्थायी नाविक नहीं थे। व्यापारी लंबे समय तक ठहरते थे और तट से दूर स्थित अंतर्देशीय धरोहर स्थलों का भ्रमण करने की जिज्ञासा रखते थे।
उन्होंने बताया कि चिकाई नाम का अर्थ है गुच्छा या मुकुट और कोर्रान का अर्थ है नेता, जिससे पता चलता है कि यह व्यक्ति प्रारंभिक ऐतिहासिक काल के व्यापारी संघों में महत्वपूर्ण स्थान रखता था।
