नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क : विदेश मंत्री एस जयशंकर के बांग्लादेश दौरे को लेकर बीते कई दिनों से लगातार चर्चा हो रही है। जयशंकर बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया के अंतिम संस्कार में शामिल होने ढाका गये थे। ढाका में उनकी मुलाकात पाकिस्तानी संसद के स्पीकर सरदार अयाज सादिक से भी हुई थी। दोनों ने एक दूसरे से हाथ मिलाया था। इस मुलाकात के बाद कई तरह की चर्चा शुरू हो गई थी। पाकिस्तानी मीडिया इस मुलाकात को बढ़ा चढ़ाकर दिखा रहा था। अब सारे विवाद पर विदेश मंत्री जयशंकर ने खुद जवाब दिया है।
IIT मद्रास में आयोजित एक कार्यक्रम में भारत की पड़ोसी नीति से जुड़े एक सवाल के जवाब में एस जयशंकर ने कहा, ‘आपके पड़ोसी बुरे भी हो सकते हैं। दुर्भाग्य से, हमारे हैं। जब आपके पड़ोसी बुरे हों, खासकर पश्चिम वाले को देखें। अगर कोई देश जानबूझकर, लगातार और बिना पछतावे के आतंकवाद जारी रखने का फैसला करता है, तो हमें अपने लोगों को आतंकवाद से बचाने का अधिकार है। हम उस अधिकार का इस्तेमाल करेंगे। हम उस अधिकार का इस्तेमाल कैसे करेंगे, यह हम पर निर्भर है।’
आतंकवाद के साथ बातचीत संभव नहीं-जयशंकर
एस जयशंकर ने आगे कहा, ‘कोई हमें यह नहीं बता सकता कि हमें क्या करना चाहिए या क्या नहीं करना चाहिए। हम खुद को बचाने के लिए जो कुछ भी करना होगा, वह हम करेंगे। कई साल पहले, हमने पानी बांटने की व्यवस्था पर सहमति जताई थी, लेकिन अगर दशकों तक आतंकवाद होता रहे, तो अच्छी पड़ोस की भावना नहीं रह सकती। अगर अच्छी पड़ोस की भावना नहीं है, तो आपको भी उस अच्छी पड़ोस की भावना का फायदा नहीं मिलेगा। आप यह नहीं कह सकते, “कृपया मेरे साथ पानी शेयर करें, लेकिन मैं आपके साथ आतंकवाद जारी रखूंगा।” यह मुमकिन नहीं है।”
हमने दुनिया को कभी भी दुश्मन नहीं माना-जयशंकर
वहीं, बांग्लादेश के साथ भारत के संबंधों पर विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा, ‘हम इतनी आसानी से ‘वसुधैव कुटुंबकम’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो असल में उस शब्द का संदेश क्या है? उस शब्द का मतलब यह है कि हमने दुनिया को कभी भी दुश्मन या खतरनाक माहौल नहीं माना, जिससे हमें खुद को बचाना पड़े। अगर आप सीमित संसाधनों के साथ समस्या सुलझाने के मोड में हैं, तो आप ज्यादा से ज्यादा असर कैसे डालेंगे? असल में यही वह समस्या है जिसे हल करना है।’
भारत की विदेश नीति के बारे मे बोलते हुए जयशंकर ने कहा, “आज भारतीय विदेश नीति में, भारतीय कूटनीति में हम यही करने की कोशिश करते हैं, और हम ऐसा अपनी प्रतिस्पर्धा का इस्तेमाल करके, अपनी ताकतों का इस्तेमाल करके, दूसरे संस्थानों और संभावनाओं का फायदा उठाकर करते हैं। “
