लखनऊ, डॉ.जितेंद्र बाजपेयी : विधानसभाओं के संचालन के लिए स्पष्ट और सुनिश्चित समय-सीमा तय किए जाने की आवश्यकता पर जोर देते हुए उत्तर प्रदेश की राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने कहा कि अल्प अवधि के सत्रों में कई बार विधायकों को अपनी बात रखने का पूरा अवसर नहीं मिल पाता, जिससे जनहित से जुड़े महत्वपूर्ण मुद्दों पर सार्थक चर्चा बाधित होती है।
सदनों की अवधि तय होना जरूरी
राज्यपाल ने कहा कि यदि विधानसभाएं केवल चार, पांच या दस दिनों के लिए संचालित होती हैं, तो समय के अभाव में जनप्रतिनिधियों की आवाज पूरी तरह सदन तक नहीं पहुंच पाती। ऐसे में सदनों की कार्यवाही को अधिक व्यवस्थित, प्रभावी और परिणामोन्मुख बनाने के लिए उनकी अवधि का स्पष्ट निर्धारण आवश्यक है।
लोकसभा अध्यक्ष के सुझाव को बताया महत्वपूर्ण
उन्होंने इस दिशा में लोकसभा अध्यक्ष द्वारा दिए गए सुझाव को अत्यंत महत्वपूर्ण बताते हुए उम्मीद जताई कि इस पर गंभीरता से विचार करते हुए ठोस निर्णय लिए जाएंगे। राज्यपाल ने आशा व्यक्त की कि सम्मेलन के दो-तीन दिनों के भीतर इस विषय पर व्यावहारिक निष्कर्ष सामने आएंगे।
पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन का उद्घाटन
राज्यपाल आनंदीबेन पटेल ने सोमवार को विधानसभा, लखनऊ में 19 से 21 जनवरी तक आयोजित अखिल भारतीय 86वें पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन का उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने देशभर से आए विधानमंडलों के पीठासीन अधिकारियों, गणमान्य अतिथियों और जनप्रतिनिधियों का स्वागत एवं अभिनंदन किया।
लखनऊ में आयोजन को बताया गौरव का विषय
उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में इस प्रतिष्ठित सम्मेलन का आयोजन होना प्रदेश के लिए गौरव का विषय है। यह सम्मेलन भारतीय संसदीय परंपराओं की सुदृढ़ता, मर्यादा और निरंतरता का जीवंत प्रतीक है। लखनऊ की तहजीब, संवाद और समन्वय की परंपरा इस आयोजन को विशेष गरिमा प्रदान करती है।
लोकतंत्र की आत्मा हैं पीठासीन अधिकारी
राज्यपाल ने पीठासीन अधिकारियों को लोकतंत्र की आत्मा का संरक्षक बताते हुए कहा कि उनकी निष्पक्षता, विवेक और मर्यादित आचरण ही सदनों को जनआकांक्षाओं की प्रभावी अभिव्यक्ति का मंच बनाते हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह सम्मेलन अनुभवों के आदान-प्रदान, श्रेष्ठ संसदीय परंपराओं के संरक्षण और नवाचारों के सृजन का सशक्त माध्यम बनेगा।
उत्तर प्रदेश की लोकतांत्रिक विरासत का उल्लेख
राज्यपाल ने उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और लोकतांत्रिक विरासत का उल्लेख करते हुए कहा कि यह प्रदेश वैदिक संस्कृति, दर्शन और लोकतांत्रिक चेतना का केंद्र रहा है। प्रयागराज, अयोध्या, वाराणसी और मथुरा जैसी पावन धरती ने भारत की आत्मा और उसके मूल्यों को दिशा दी है।
बहस नहीं, समाधान से तय होती है सदन की सार्थकता
उन्होंने कहा कि विधानमंडल जनआकांक्षाओं को स्वर देने का पवित्र मंच है और सदन की सार्थकता केवल बहसों की संख्या से नहीं, बल्कि लोककल्याण की भावना, तथ्यपरक और समाधानोन्मुख चर्चाओं से तय होती है। संवाद जब समाधान में परिवर्तित होता है, तभी संसदीय लोकतंत्र सशक्त और विश्वासयोग्य बनता है।
व्यवधान लोकतंत्र के लिए चुनौती
राज्यपाल ने सदन की कार्यवाहियों में व्यवधान को एक गंभीर चुनौती बताते हुए कहा कि इससे जनहित के महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा बाधित होती है और लोकतंत्र के प्रति जनता का विश्वास प्रभावित होता है। उन्होंने विचारों की भिन्नता को लोकतंत्र की शक्ति बताते हुए असहमति को लोकतांत्रिक सौंदर्य के रूप में स्वीकार करने का आह्वान किया।
विधानसभा की संसदीय पद्धति पर पुस्तक की सराहना
राज्यपाल ने उत्तर प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष सतीश महाना के मार्गदर्शन में प्रकाशित पुस्तक ‘उत्तर प्रदेश विधानसभा की संसदीय पद्धति और प्रक्रिया’ की सराहना करते हुए कहा कि यह प्रकाशन लोकतांत्रिक मर्यादाओं और संसदीय अनुशासन का महत्वपूर्ण पथप्रदर्शक सिद्ध होगा।
सम्मेलन से सकारात्मक निष्कर्षों की उम्मीद
उन्होंने विश्वास जताया कि सम्मेलन में गहन, संतुलित और सार्थक विचार-विमर्श होगा तथा यह आयोजन संसदीय प्रणाली को और अधिक सशक्त, संवेदनशील और प्रभावी बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
