नई दिल्ली, संवाददाता : राष्ट्रीय राजधानी में प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए आवंटित बजट के उपयोग को लेकर एक महत्वपूर्ण जानकारी सामने आई है।
सूचना के अधिकार (आरटीआइ) के तहत मिले जवाब से पता चला है कि वित्त वर्ष 2025-26 के लिए प्रदूषण नियंत्रण और आपातकालीन उपायों के तहत दिल्ली सरकार द्वारा आवंटित 300 करोड़ रुपये के बजट में से 20 जनवरी, 2026 तक केवल 43 प्रतिशत (लगभग 129.83 करोड़ रुपये) राशि ही खर्च की जा सकी है। आलम यह है कि दिल्ली सरकार वायु प्रदूषण से जंग के लिए केंद्र सरकार से मिला बजट भी खर्च नहीं कर पाई।
इस आरटीआइ के जवाब में दिल्ली सरकार के पर्यावरण विभाग ने बताया है कि खर्च की गई अधिकांश राशि अल्पकालिक उपायों और लोक निर्माण विभाग (पीडब्ल्यूडी) को हस्तांतरित किए गए फंड पर खर्च हुई है।
पर्यावरण विभाग ने स्पष्ट किया कि वह प्रदूषण नियंत्रण के लिए डीडीए, एमसीडी और दिल्ली जल बोर्ड जैसी कई एजेंसियों के साथ मिलकर काम कर रहा है। नियमित रूप से समीक्षा बैठकें भी की जा रही हैं। हालांकि, जानकारों का मानना है कि बजट का समय पर उपयोग न होना दिल्ली की हवा सुधारने की कोशिशों में बाधा बन सकता है।
कई योजनाओं में शून्य खर्च
चौंकाने वाली बात यह है कि कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं के लिए आवंटित करोड़ों रुपये का उपयोग अब तक शुरू ही नहीं हो पाया है। आरटीआइ के अनुसार 20 जनवरी तक निम्नलिखित मदों में शून्य व्यय दर्ज किया गया।
अन्य विभागों की स्थिति
अन्य क्षेत्रों में भी बजट उपयोग की स्थिति मिली-जुली रही। महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट फार क्लाइमेट चेंज ने 9.34 करोड़ में से 5.91 करोड़ रुपये खर्च किए। वहीं, आइआइटी कानपुर के साथ क्लाउड सीडिंग (कृत्रिम वर्षा) के पायलट प्रोजेक्ट के लिए 3.80 करोड़ रुपये आवंटित थे, जिसमें से केवल 38 लाख रुपये ही खर्च हुए।
मिले फंड के इस्तेमाल में भी फिसड्डी साबित हुई है दिल्ली
दिल्ली में वायु प्रदूषण की गंभीर स्थिति के बीच, राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (एनसीएपी) के तहत मिले केंद्र के फंड का उपयोग करने में भी शहर काफी पिछड़ा हुआ है। सेंटर फार साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली एनसीएपी के फंड के उपयोग में फिसड्डी साबित हुई है, जहां 2019 से अब तक आवंटित राशि का 40 प्रतिशत से भी कम उपयोग किया गया है।
गंभीर वायु प्रदूषण के बावजूद, दिल्ली ने 2020-21 से 2025-26 के बीच मिले 113 करोड़ में से केवल 14 करोड़ (लगभग 12-14 प्रतिशत) खर्च किए हैं, जो कम उपयोग और खराब प्रबंधन को दर्शाता है।
