नई दिल्ली,एजेंसी : नकली नोट, फर्जी दस्तावेज और ब्रांडेड उत्पादों की नकल आज वैश्विक चुनौती बन चुकी है। ऐसे में अब विज्ञान ने इस जालसाजी के खिलाफ एक नई ‘प्रकाश ढाल’ तैयार की है। आईआईटी गुवाहाटी के शोधकर्ताओं ने एक अत्याधुनिक प्रकाश-उत्सर्जक पेरोव्स्काइट नैनोमैटेरियल विकसित किया है, जो ऐसे सुरक्षा पैटर्न बना सकता है जिन्हें सामान्य प्रिंटिंग या इमेजिंग तकनीकों से कॉपी करना लगभग असंभव होगा।
यह तकनीक भविष्य में करेंसी, सरकारी दस्तावेजों और महंगे उत्पादों की नकल को रोकने व पहचानने में बड़ी भूमिका निभा सकती है। व्यापक स्तर पर यह तकनीक उन सभी क्षेत्रों में उपयोगी हो सकती है, जहां उत्पाद प्रमाणीकरण और सुरक्षा अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। करेंसी नोट, पासपोर्ट, पहचान पत्र और कानूनी दस्तावेजों की सुरक्षा से लेकर लक्जरी वस्तुओं और उपभोक्ता उत्पाद उद्योगों तक इसका उपयोग किया जा सकता है।
इस शोध को वैश्विक स्तर पर स्वीकार्यता
खास बात यह है कि इस शोध को वैश्विक स्तर पर स्वीकार्यता मिली है। इसके निष्कर्ष प्रतिष्ठित जर्नल एडवांस्ड ऑप्टिकल मैटेरियल्स में प्रकाशित हुए हैं। शोध-पत्र आईआईटी गुवाहाटी के सहायक प्रोफेसर प्रो. सैकत भौमिक, प्रो. पी. के. गिरी तथा उनके शोधार्थी लतिका जुनेजा और गरिमा चौधरी ने तैयार किया है।
दरअसल, नकली उत्पादों की समस्या दवा उद्योग, इलेक्ट्रॉनिक्स, बैंकिंग और पहचान दस्तावेजों सहित कई क्षेत्रों को प्रभावित कर रही है। आधुनिक तकनीकों की सहायता से अपराधियों ने बारकोड, क्यूआर कोड, होलोग्राम और वॉटरमार्क लेबल जैसी पारंपरिक सुरक्षा प्रणालियों की सटीक नकल करने के तरीके खोज लिए हैं। ऐसे में ये चुनौतियां राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी प्रभाव डाल सकती हैं, क्योंकि इनके माध्यम से वित्तीय धोखाधड़ी, अवैध गतिविधियों और सुरक्षा उल्लंघनों के जोखिम बढ़ जाते हैं।
इसी कारण स्मार्ट और एंटी-काउंटरफिटिंग सिस्टम की मांग तेजी से बढ़ रही है। इस चुनौती का समाधान करने के लिए प्रोफेसर सैकत भौमिक, प्रोफेसर पीके गिरी और उनकी शोध टीम ने प्रकाश उत्सर्जित करने वाले पेरोव्स्काइट नैनोक्रिस्टल विकसित किए हैं। यह क्रिस्टलीय पदार्थों का एक समूह है, जो अपने विशेष प्रकाशीय और इलेक्ट्रॉनिक गुणों के लिए जाना जाता है। इनका आकार नैनोमीटर स्तर का होता है। यह मानव बाल की चौड़ाई से लगभग एक लाख गुना छोटा होता है। इनमें अत्यधिक शुद्ध तथा तीव्र रंगों को बहुत संकीर्ण उत्सर्जन सीमा में उत्पन्न करने की क्षमता होती है।
यह सुरक्षित प्रमाणीकरण तकनीकों के लिए उपयुक्त
यह गुण सटीक प्रकाशीय संकेत (ऑप्टिकल सिग्नेचर) प्रदान करने के साथ-साथ पारंपरिक फ्लोरोसेंट पदार्थों की तुलना में अधिक रंग विविधता उपलब्ध कराता है, इसलिए यह सुरक्षित प्रमाणीकरण तकनीकों के लिए उपयुक्त है। हालांकि, इन पदार्थों की एक बड़ी चुनौती यह है कि नमी, गर्मी और पर्यावरणीय परिस्थितियों के संपर्क में आने पर ये आसानी से खराब हो जाते हैं। इस समस्या को हल करने के लिए शोध टीम ने नैनोक्रिस्टल के चारों ओर डबल-लेयर कोटिंग विकसित की। इससे वे गर्मी और रसायनों के प्रति अधिक प्रतिरोधी बन गए और साथ ही उनकी प्रकाश उत्सर्जन क्षमता भी बनी रही।
इसके बाद, डायरेक्ट लेजर राइटिंग तकनीक की सहायता से टीम ने इन पदार्थों से सूक्ष्म पैटर्न तैयार किए। बहु-स्तरीय कोटिंग ने पारंपरिक लिथोग्राफिक मास्क के बिना इन पैटर्नों का निर्माण संभव बनाया, जिससे 10 से 40 माइक्रोमीटर तक की उच्च रिजॉल्यूशन प्राप्त हुई और अत्यंत जटिल पैटर्न तथा सूचना को एनकोड करना संभव हुआ।
उत्सर्जन तीव्रता पर्यावरण के अनुसार
विकसित तकनीक के बारे में बताते हुए प्रो. सैकत भौमिक ने कहा, “इस पेरोव्स्काइट सामग्री की एक अनूठी विशेषता यह है कि सामान्य सुरक्षा लेबलों की तरह यह हमेशा एक जैसा संकेत नहीं देती। इसमें अत्यंत संकीर्ण उत्सर्जन स्पेक्ट्रा होता है। इसकी उत्सर्जन तीव्रता पर्यावरण के अनुसार बदलती है। उदाहरण के लिए, एक अदृश्य फ्लोरोसेंट पैटर्न को गर्म करके मिटाया जा सकता है और फिर रासायनिक प्रक्रिया के माध्यम से पुन उत्पन्न किया जा सकता है। इसका अर्थ है कि यह सुरक्षा लेबल केवल यूवी प्रकाश में चमकता नहीं है, बल्कि विशिष्ट परिस्थितियों में एक पूर्वनिर्धारित तरीके से प्रतिक्रिया करता है।”
उन्होंने कहा कि यदि कोई जालसाज इसकी नकल करना चाहता है, तो उसे केवल दृश्य पैटर्न ही नहीं बल्कि नैनोक्रिस्टल की गर्मी और रसायनों के प्रति प्रतिक्रिया को भी दोहराना होगा। इससे पारंपरिक तकनीकों का उपयोग करके इसकी नकल करना अत्यंत कठिन हो जाता है। इसमें कंपनी उत्पादों और बैंक नोटों में सुरक्षित सूचना भंडारण और पुनर्प्राप्ति की भी क्षमता है। शोधकर्ताओं ने इस तकनीक को ‘4डी एंटी-काउंटरफिटिंग’ नाम दिया है।
बता दें कि आईआईटी गुवाहाटी द्वारा विकसित लेजर पैटर्निंग तकनीक का उपयोग स्मार्टफोन, पहनने योग्य उपकरणों (वियरेबल्स) और ऑगमेंटेड रियलिटी प्रणालियों के लिए उन्नत माइक्रो-एलईडी डिस्प्ले विकसित करने में भी किया जा सकता है।
