सरकार ने कैप्टिव पावर व्यवस्था की मजबूती के लिए बिजली नियमों में संशोधन

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नई दिल्ली, न्यूज़ डेस्क : भारत सरकार ने इलेक्ट्रिसिटी (अमेंडमेंट) रूल्स, 2026 को अधिसूचित किया है, जिसमें इलेक्ट्रिसिटी रूल्स, 2005 के रूल 3 में बदलाव किए गए हैं। ये बदलाव कैप्टिव जनरेटिंग प्लांट से जुड़े नियमों को स्पष्ट और सरल बनाने के लिए किए गए हैं। इनका उद्देश्य उद्योगों के लिए बिजली उत्पादन को आसान बनाना, नियमों की स्पष्टता देना और भारत के ऊर्जा संक्रमण तथा औद्योगिक विकास के लक्ष्यों के अनुरूप कैप्टिव जनरेशन ढांचा तैयार करना है।

कैप्टिव पावर, यानी अपनी जरूरत के लिए खुद बिजली उत्पादन करना, इलेक्ट्रिसिटी एक्ट, 2003 के तहत उद्योगों के लिए महत्वपूर्ण प्रावधान रहा है। इससे उद्योगों को बिजली की आपूर्ति में आने वाली कठिनाइयों और लागत के उतार-चढ़ाव से निपटने में मदद मिलती है। आज भारतीय उद्योग गैर-फॉसिल ईंधन आधारित ऊर्जा अपनाकर स्थिरता और लागत में कमी ला रहे हैं। ऐसे में कैप्टिव पावर के लिए साफ, पूर्वानुमेय और लागू करने योग्य नियम होना बेहद जरूरी है।

बिजली का उत्पादन नजदीकी जगह पर करने से ट्रांसमिशन लॉस कम

बिजली का उत्पादन नजदीकी जगह पर करने से ट्रांसमिशन लॉस कम होते हैं, सिस्टम की दक्षता बढ़ती है और ग्रिड मजबूत होता है। नए नियमों से कैप्टिव पावर के नियमों को लागू करने में स्पष्टता आएगी और स्वामित्व व खपत संबंधी कानूनी सुरक्षा बनी रहेगी।

अब कैप्टिव प्लांट के स्वामित्व में सब्सिडियरी, होल्डिंग कंपनी और उसकी अन्य सब्सिडियरी को भी शामिल किया गया है। इससे कॉर्पोरेट समूहों द्वारा किए गए निवेशों को कैप्टिव स्टेटस देने में कोई दिक्कत नहीं होगी। इसके साथ ही कैप्टिव स्टेटस का सत्यापन पूरे वित्तीय वर्ष के लिए होगा। पहले या अंतिम वर्ष में केवल संबंधित हिस्से के लिए सत्यापन किया जाएगा।

इसके अलावा, समूह कैप्टिव प्रोजेक्ट में लचीलापन बढ़ाया गया है। सदस्य अपनी जरूरत के अनुसार बिजली ले सकते हैं। 26 प्रतिशत या अधिक हिस्सेदारी वाले सदस्य पूरे खपत को कैप्टिव मान सकते हैं। 1 अप्रैल 2026 से राज्य/संघ राज्य सरकारें इंट्रा-स्टेट कैप्टिव खपत का सत्यापन करने के लिए नोडल एजेंसी नियुक्त कर सकती हैं। इंटर-स्टेट खपत के लिए सत्यापन एनएलडीसी करेगा। किसी विवाद के लिए ग्रीवांस रेड्रेसल समिति बनेगी।

सत्यापन तक सीएसएस और एएस नहीं लगाए जाएंगे, बशर्ते उपयोगकर्ता सही घोषणा करें। अगर बाद में प्लांट कैप्टिव नहीं पाया जाता तो सीएसएस/एएस लेट पेमेंट चार्ज के साथ देना होगा। एसोसिएशन ऑफ पर्सन्स से जुड़ी खपत, सत्यापन और सीएसएस/एएस से संबंधित प्रावधान 1 अप्रैल 2026 से लागू होंगे। अन्य बदलाव तुरंत प्रभावी होंगे।

ये बदलाव उद्योगों को सस्ती और भरोसेमंद बिजली उपलब्ध कराने, उनकी प्रतिस्पर्धात्मक क्षमताओं को मजबूत करने और भारत को सतत और स्वावलंबी ऊर्जा भविष्य की दिशा में ले जाने में मदद करेंगे।

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