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लखनऊ ,शैलेश पाल : शिवा शर्मा हत्याकांड की मुख्य आरोपी श्रद्धा दुबे के शातिरपने में कोई कमी नहीं थी। कदम कदम पर पुलिस को मात दी। पुलिस मोबाइल लोकेशन के भरोसे बैठी रही तो उसने सिम ही निकाल कर फेक दिया था। वह राह चलते किसी से भी वाई-फाई लेकर इधर उधर बातचीत करती थी। बातचीत फेसटाइम व व्हाट्सएप पर ही करती थी। इस खेल के जरिये पुलिस को छका रही थी लेकिन आखिर में वह खुद इसी वजह से जाल में फंस गई। क्योंकि उसने नागपुर ले जाने वाले कैब के मोबाइल से वाईफाई इस्तेमाल किया था। इसी के जरिये पुलिस उस तक पहुंची।

दरअसल श्रद्धा, उसकी बहन रश्मि और ड्राइवर दानिश ने फरार होने के बाद अपने मोबाइल नंबर से नॉर्मल कॉल किसी को नहीं की। तीनों ने सिम निकाल दिए थे। इसलिए इसके जरिये ट्रेस करना मुश्किल था। मगर कुछ वक्त गुजरने के बाद अचानक से उनके मोबाइल पर इंटरनेट एक्टिव होने की जानकारी पुलिस को मिली। कुछ देर इंटरनेट चलता था फिर वह बंद हो जाता था। एक तरह से लुकाछिपी का खेल चलता रहा। तब पुलिस आईपी एड्रेस करने में जुटी रही लेकिन उसको कामयाबी नहीं मिली।

इसलिए मिल रही थी नाकामी
फरार होने के दौरान आरोपियों ने रिक्शा, ई-रिक्शा, टैक्सी, कैब आदि में सफर किया। जब जहां जिसे मिली उसका इंटरनेट इस्तेमाल किया। जब पुलिस आईपी एड्रेस ट्रेस करते हुए वहां पहुंचती थी तो पता चलता था कि कि वह रिक्शा चालक है या कैब आदि चालक। इस तरह से श्रद्धा चकमा देने में जुटी थी। ये सभी उसके बारे में कोई जानकारी नहीं पा रहे थे।

ड्राइवर पकड़ में आया, तब श्रद्धा गिरफ्त में आई

जब कानपुर से श्रद्धा ने नागपुर के लिए टैक्सी बुक की तब चालक के मोबाइल के इंटरनेट ने अपना मोबाइल जोड़ा। कुछ कुछ अंतराल पर कनेक्शन जोड़ा जा रहा था फिर बंद किया जा रहा था। पुलिस इसके आधार पर उसी रूट पर सक्रिय हो गई। प्रयागराज से एसटीएफ की भी टीम रवाना हुई, क्योंकि कानपुर के बाद उसकी लोकेशन फतेहपुर में मिली थी। इसी तरह ट्रेस करते करते पुलिस नागपुर पहुंची। जब चालक आरोपियों को छोड़कर निकला तो लखनऊ पुलिस के इनपुट पर उसको नागपुर पुलिस ने पकड़ लिया। फिर वही ड्राइवर श्रद्धा के फ्लैट तक पुलिस को पहुंचाया। इस तरह श्रद्धा अपने ही जाल में फंस, जिसके जरिए वह दस दिनों तक बचती आ रही थी।

शातिर श्रद्धा दुबे ने पुलिस को दस दिनों तक छकाया। श्रद्धा अपनी बहन और ड्राइवर के साथ करीब 2200 किमी का सफर किया। होटलों व लॉज में ठहरीं। वह आगे आगे चल रही थीं और उनके पीछे-पीछे पुलिस खाक छानती रही। आठ से दस ऐसे ठिकाने हैं जहां से पुलिस के पहुंचने के पांच-छह घंटे पहले ही ये तीनों निकल जाते थे। यही वजह है कि पुलिस की नाकामी की कहानी बढ़ती गई। 11वें दिन जाकर पुलिस उस तक पहुंच सकी।

वारदात की रात यानी 9 अक्तूबर को श्रद्धा अपनी बहन रश्मि और ड्राइवर दानिश के साथ घायल शिवा को लेकर केजीएमयू पहुंची थीं। फिर यहीं से वह निकल गई थी। लखनऊ से सीधे वह सीतापुर महमूदाबाद होते हुए बहराइच पहुंची। यहां रुपईडीहा बॉर्डर पार कर नेपाल में दाखिल हो गई थी। पुलिस के मुताबिक नेपाल के बुटवल में गई। यहां बिना आईडी वाले एक होटल में रुकी। तभी पुलिस को उसके नेपाल जाने की सूचना मिल गई थी। पुलिस वहां पहुंची जरूर लेकिन उस तक नहीं पहुंच सकी। 16 अक्तूबर को तीनों ने नेपाल छोड़ दिया।

वह गोरखपुर के रास्ते देर रात रायबरेली पहुंची

वह गोरखपुर के रास्ते देर रात रायबरेली पहुंची। यहां तीन घंटे तक रुकी। होटल की भी तलाश की लेकिन बिना आईडी होटल नहीं मिल सका। इसलिए वहां से तीनों टैक्सी कर लखनऊ आउटर होते हुए 17 की सुबह आगरा पहुंच गई। एक होटल में रुकी। जिसके फुटेज भी सामने आए। यहां से 18 की सुबह लखनऊ आई और विभूतिखंड इलाके में एक न्यूज एजेंसी को बाइट दी। शाम को जब ये बाइट मीडिया में आई तो पुलिस के हाथ-पैर फूल गए। क्योकि उनको अपनी नाकामी का एहसास था। साफ था कि श्रद्धा आगे आगे और पुलिस बस पीछे पीछे चल रही है।

कदम कदम पर शातिरपन

14 अक्तूबर को पुलिस के रडार से श्रद्धा गायब हो गई थी। की लोकेशन अगले दिन नेपाल के बुटवल में मिली। 16 अक्तूबर को महराजगंज के भगवानपुर बॉर्डर के चोर रास्ते से यूपी में दाखिल हुई। पहचान छिपाने के लिए बुर्का पहना और ट्रॉली बैग स्थानीय ड्राइवर को देकर कपड़े के झोले खरीदे। इसके बाद उसी ड्राइवर के साथ नौतनवा पहुंची। वहां से किराये की अर्टिगा से रायबरेली रवाना हो गई।

कानपुर में बदली टैक्सी
लखनऊ में बाइट देने के बाद श्रद्धा ने कमता से नागपुर के लिए टैक्सी बुक की। इस अर्टिका कार में सिर्फ 80किमी प्रति घंटे की ही अधिकतम रिफ्तार थी। लिहाजा कानपुर में इस टैक्सी को छोड़ दिया। कानपुर से दूसरी अर्टिका बुक की। फिर फतेहपुर सतना, आदि शहरों को होते हुए नागपुर पहुंची। वहां पर उसको अंदेशा था कि वह सुरक्षित है। यहां तक पुलिस नहीं आ पाएगी। नागपुर में वह धरी गई। हालांकि इसके पहले तक पुलिस को खूब छकाया।

बॉर्डर पार कर जाना भी बड़ी विफलता

घटना के कुछ ही देर बाद श्रद्धा भाग निकली थी। हजरतगंज पुलिस तब तक कुछ भाप ही नहीं सकी थी। मानो उनको घटना का अंदाजा ही नहीं था जबकि पीड़ित परिवार ने उसी वक्त श्रद्धा व उसके साथियों पर हत्या का आरोप लगाया था। इसके बावजूद पुलिस सक्रिय नहीं हुई। पुलिस हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। दूसरे दिन तड़के वह नेपाल पहुंच गई। जब केस दर्ज हुआ तब उसकी तलाश शुरू हुई।