नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क : राज्यसभा में वंदे मातरम पर हुई चर्चा के दौरान भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और सदन के नेता जेपी नड्डा ने कहा कि वंदे मातरम को वह सम्मान और स्थान नहीं मिला, जो उसे मिलना चाहिए था। उन्होंने इस स्थिति के लिए उस समय के शासकों को जिम्मेदार बताया। नड्डा के बयान पर प्रतिक्रिया देते हुए राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने पूछा कि क्या वर्ष 1937 में जवाहरलाल नेहरू देश के प्रधानमंत्री थे। इस पर नड्डा ने कहा कि वे प्रधानमंत्री नहीं थे, लेकिन इंडियन नेशनल कांग्रेस के अध्यक्ष थे।
जेपी नड्डा ने वंदे मातरम को केवल दो अंतरों तक सीमित करने से संबंधित प्रस्ताव का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि प्रस्ताव में कहा गया था कि राष्ट्रीय आयोजनों में वंदे मातरम के सिर्फ पहले दो अंतरे ही गाए जाएं, और आयोजकों को यह स्वतंत्रता हो कि वे वंदे मातरम के अलावा किसी अन्य आपत्तिहीन गीत को, चाहें उसके साथ या उसकी जगह, गाने का निर्णय स्वयं लें। उन्होंने कहा, “इसीलिए मैं कहता हूं कि वंदे मातरम को वह सम्मान नहीं मिला, जो मिलना चाहिए था।”मोहम्मद अली जिन्ना ने लखनऊ सत्र में वंदे मातरम के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया
राष्ट्रीय गान पर औपचारिक रूप से नौ मिनट से भी कम समय दिया गया
नड्डा ने बताया कि संविधान सभा के तीन वर्ष के कार्यकाल में कुल 167 कार्य दिवस हुए, लेकिन राष्ट्रीय गान पर औपचारिक रूप से नौ मिनट से भी कम समय दिया गया। अनेक सदस्यों द्वारा बार-बार मांग उठाए जाने के बावजूद इस विषय पर विस्तृत चर्चा की अनुमति नहीं दी गई। उन्होंने कहा कि 15 अक्टूबर 1937 को मोहम्मद अली जिन्ना ने लखनऊ सत्र में वंदे मातरम के खिलाफ एक प्रस्ताव पारित किया। नड्डा के अनुसार, जवाहरलाल नेहरू ने इसका विरोध करने के बजाय वंदे मातरम को लेकर जांच शुरू करवाई और 20 अक्टूबर को सुभाष चंद्र बोस को पत्र लिखकर स्वीकार किया कि वंदे मातरम की पृष्ठभूमि मुस्लिम समुदाय को असहज कर सकती है।
वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ
मल्लिकार्जुन खड़गे ने नड्डा को बीच में टोका और कहा, “आपके नेता ने इसे खुद स्वीकार किया था। आपके नेता उस समय की सरकार में शामिल थे। जिन चीजों में आपकी सहभागिता थी, आपके अध्यक्ष भी उसमें शामिल थे। उसी बात को आप यहां नकार रहे हैं।” खड़गे ने यह भी कहा कि, “यह बहस वंदे मातरम की 150वीं वर्षगांठ पर हो रही है या जवाहरलाल नेहरू पर?”
अंग्रेज वंदे मातरम से घबराते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि यह गीत भारतीयों को जागरूक करता है
नड्डा ने कहा कि अंग्रेज वंदे मातरम से घबराते थे, क्योंकि उन्हें लगता था कि यह गीत भारतीयों को जागरूक करता है। उन्होंने बताया कि वंदे मातरम की गूंज तमिलनाडु तक पहुंची और वहां हुए आंदोलनों में यह गीत गाया गया। उन्होंने कहा कि खुदीराम बोस के अंतिम शब्द भी ‘वंदे मातरम’ थे। जेपी नड्डा ने कहा कि वंदे मातरम हम सभी को प्रेरणा देने वाला और देश को एकता के साथ आगे बढ़ाने वाला गीत है।
