नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क : सुप्रीम कोर्ट में राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम को कानूनी सुरक्षा देने के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान मंगलवार को तीखी बहस देखने को मिली। वरिष्ठ वकील और पूर्व जज एस. मुरलीधर ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता द्वारा नक्सली शब्द के इस्तेमाल पर कड़ा ऐतराज जताया और इसे तुरंत वापस लेने की मांग की। क्यों छिड़ी तीखी बहस ? कर्नाटक संगीतकार टी. एम. कृष्णा की ओर से पैरवी कर रहे वरिष्ठ वकील एस. मुरलीधर ने तर्क दिया कि वंदे मातरम को कानूनी सुरक्षा देने का कानून बिना किसी व्यापक सार्वजिनक चर्चा के बना दिया गया है। उन्होंने कहा, ‘कानून बनाने की प्रक्रिया टॉप डाउन एप्रोच नहीं होनी चाहिए बल्कि जनमत के साथ विकसित होनी चाहिए। मुरलीधर के इस तर्क पर हस्तक्षेप करते हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, ‘कानून बनाना संविधान के अनुसार होता है। कानून का निर्माण नक्सलियों के विचारों के हिसाब से नहीं हो सकता।’ नक्सली शब्द पर मुरलीधर ने जताई आपत्ति सॉलिसिटर जनरल की इस टिप्पणी पर मुरलीधर ने कड़ी आपत्ति जताई। उन्होंने कहा, ‘सॉलिसिटर जनरल को अपने ये शब्द वापस लेने चाहिए। यह सुनवाई लाइव चल रही है और एक शीर्ष कानून अधिकारी को ऐसी भाषा का इस्तेमाल करना शोभा नहीं देता।’ सॉलिसिटर जनरल ने इसका जवाब देते हुए कहा कि वो अपनी बात पर कायम हैं और उन्होंने किसी व्यक्ति को नहीं बल्कि किसी एक खास विचारधारा को लेकर बात कही है। उन्होंने स्पष्ट किया कि फैसला संसद द्वारा संवैधानिक प्रक्रिया के तहत लिया गया था और उन्हें अपने बयान पर कोई पछतावा नहीं है। वरिष्ठ वकीलों ने किया हस्तक्षेप इस पूरे मामले में जारी तीखी बहस को देखते हुए चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने हस्तक्षेप किया। जस्टिस जॉयमाल्य बागची ने मामले को शांत करते हुए कहा कि कोर्ट ने खुद को केवल संवैधानिक मुद्दों तक ही सीमित रख रहा है। उन्होंने टिप्पणी की, ‘भले ही आप किसी को नक्सली कहें, लेकिन उसके संवैधानिक अधिकार खत्म नहीं हो जाते। आतंकवाद के आरोपी को भी अदालत में निष्पक्ष सुनवाई का पूरा अधिकार है।’ इसी दौरान कोर्ट में मौजूद वरिष्ठ वकील संजय हेगड़े ने भी बीच में बोलते हुए कहा, “किसी मुद्दे पर अलग सोच रखने का मतलब यह नहीं कि इंसान नक्सली हो जाए।’ सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से मांगा जवाब इस पूरी बहस के बाद कोर्ट ने केंद्र सरकार से जवाब मांगा और 1986 के उस फैसले का हवाला दिया जिसमें राष्ट्रगान न गाने पर बच्चों को कानूनी कार्रवाई से राहत दी गई थी। कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई तक दोनों पक्षों को अपने संवैधानिक तर्क संभालकर रखने का निर्देश दिया। साथ ही पीठ ने ये भी साफ किया कि वह केवल संविधान की व्याख्या से जुड़े कानूनी पहलुओं पर विचार कर रही है। Post navigation 7 दिन में खोल सकते हैं होर्मुज, ईरान ने अमेरिका के सामने रखी 1 शर्त त्योहारो में आपकी जेब पर नहीं पड़ेगा भारी हवाई किराए का बोझ