नई दिल्ली, न्यूज़ डेस्क : राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में लोगों की आंखों की रोशनी से जुड़ी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं। हाल ही में सामने आई एक रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली की लगभग 30% आबादी किसी न किसी प्रकार के दृष्टि दोष से प्रभावित है। विशेषज्ञों का मानना है कि बदलती जीवनशैली, लंबे समय तक स्क्रीन के सामने बिताया जाने वाला समय और इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स का अत्यधिक उपयोग इस समस्या को और गंभीर बना रहा है।
एम्स (AIIMS) की रिपोर्ट में हुआ खुलासा
दिल्ली स्थित ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज़ (एम्स) के डॉ. राजेंद्र प्रसाद सेंटर फॉर ऑप्थल्मिक साइंसेज़ के कम्युनिटी ऑप्थल्मोलॉजी विभाग ने नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के रिफ्रैक्टिव एरर सिचुएशन एनालिसिस टूल (RESAT) पर आधारित रिपोर्ट जमा की है। इस रिपोर्ट में राजधानी में आंखों की देखभाल से जुड़ी सेवाओं, चुनौतियों और जरूरतों का विस्तृत आकलन किया गया है।
बदलती जीवनशैली बन रही बड़ी वजह
कम्युनिटी ऑप्थल्मोलॉजी विभाग के प्रमुख डॉ. प्रवीण वशिष्ठ के अनुसार, दिल्ली में दृष्टि दोष बढ़ने के पीछे सबसे बड़ी वजह लोगों की बदलती जीवनशैली है। उन्होंने कहा कि मोबाइल फोन, कंप्यूटर और अन्य इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों का लंबे समय तक इस्तेमाल आंखों पर दबाव डाल रहा है, जिससे कम उम्र में ही लोगों की नजर कमजोर होने लगी है।
क्या है RESAT प्रोग्राम
विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा विकसित RESAT (Refractive Error Situation Analysis Tool) एक व्यापक मूल्यांकन प्रणाली है। इसके माध्यम से किसी क्षेत्र में रिफ्रैक्टिव एरर से जुड़ी सेवाओं, नीतियों और कार्यक्रमों की प्रभावशीलता का आकलन किया जाता है। यह टूल स्वास्थ्य नीतियों को मजबूत करने और गुणवत्तापूर्ण नेत्र देखभाल सेवाओं तक सार्वभौमिक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए साक्ष्य-आधारित रोडमैप प्रदान करता है।
रिफ्रैक्टिव एरर का बढ़ता बोझ
रिपोर्ट के मुताबिक दिल्ली में अनकरेक्टेड रिफ्रैक्टिव एरर का बोझ काफी बड़ा है। अनुमान है कि राजधानी की लगभग 29.5% आबादी, यानी करीब 60 लाख लोग अनकरेक्टेड रिफ्रैक्टिव एरर या प्रेसबायोपिया से प्रभावित हैं। 50 वर्ष और उससे अधिक उम्र के लोगों में इसका प्रचलन सबसे ज्यादा पाया गया है, जहां करीब 70% लोग इस समस्या से जूझ रहे हैं। वहीं स्कूल जाने वाले बच्चों में मायोपिया (निकट दृष्टि दोष) तेजी से बढ़ रहा है। नई दिल्ली में बच्चों में मायोपिया की दर 13.1% दर्ज की गई है।
दृष्टि सेवाओं में लैंगिक असमानता
रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2024 में दूर की दृष्टि के लिए प्रभावी रिफ्रैक्टिव एरर कवरेज 59.8% और पास की दृष्टि के लिए 47.1% आंका गया। हालांकि इसमें लैंगिक असमानता भी देखने को मिली है, जहां महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम कवरेज मिल पा रहा है।
आई केयर संसाधनों की भी कमी
रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि दिल्ली में प्रशिक्षित ऑप्टोमेट्रिस्ट की कमी बनी हुई है। राजधानी में कुल 249 आई केयर संस्थानों की पहचान की गई है, जिनमें से 77.5% निजी क्षेत्र, 14.5% सार्वजनिक क्षेत्र और 8% गैर-सरकारी संगठनों द्वारा संचालित किए जा रहे हैं। फिलहाल दिल्ली में 1,085 ऑप्थल्मोलॉजिस्ट और 489 योग्य ऑप्टोमेट्रिस्ट या ऑप्थल्मिक टेक्नीशियन सेवाएं दे रहे हैं। इसके बावजूद जनसंख्या के अनुपात में विशेषज्ञों की उपलब्धता सीमित है। यहां ऑप्थल्मोलॉजिस्ट-टू-पॉपुलेशन अनुपात 1:18,043 है।
प्राथमिक स्तर पर सेवाओं में बड़ा अंतर
रिपोर्ट के अनुसार प्राथमिक स्वास्थ्य स्तर पर नेत्र देखभाल सेवाओं में भी बड़ा अंतर मौजूद है। सार्वजनिक क्षेत्र के तहत जहां 269 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों/आयुष्मान आरोग्य मंदिरों की आवश्यकता है, वहीं वर्तमान में विभिन्न संस्थाओं द्वारा केवल 50 कार्यात्मक विज़न सेंटर संचालित किए जा रहे हैं।
बच्चों में स्क्रीन टाइम का असर
विशेषज्ञों का मानना है कि प्राथमिक स्तर पर नेत्र देखभाल सेवाओं को मजबूत करना, नियमित आंखों की जांच को बढ़ावा देना और बच्चों में स्क्रीन टाइम को नियंत्रित करना इस बढ़ती समस्या को कम करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है।
