आगरा, संवाददाता :आगरा के सूर सरोवर पक्षी विहार से विलायती बबूल हटाकर देसी पौधे लगाने की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है। याचिका में जैव विविधता और प्रवासी पक्षियों पर खतरे का हवाला देते हुए इको-रेस्टोरेशन की मांग की गई है, जिस पर 22 मई को सुनवाई होगी।
800 हेक्टेयर में फैले सूर सरोवर पक्षी विहार में विलायती बबूल हटाने की मांग करते हुए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है। पर्यावरणविद डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य की याचिका पर 22 मई को सुनवाई होगी। याचिका में देसी प्रजाति के पौधों को सूर सरोवर में लगाने की मांग की है। उन्होंने विलायती बबूल के कारण स्थानीय जैव विविधता पूरी तरह नष्ट होने और प्रवासी पक्षियों पर संकट बताया है।
डॉ. देवाशीष भट्टाचार्य ने याचिका में कहा कि विलायती बबूल विदेशी प्रजाति है जो मूल रूप से मैक्सिको और मध्य अमेरिका की है। इसकी गहरी जड़ें भूजल को सोख लेती हैं, जिससे गंभीर जल संकट पैदा होता है और आसपास के स्थानीय पेड़-पौधे सूख जाते हैं। इसके जहरीले प्रभावों के कारण अन्य वनस्पतियों के बीज अंकुरित नहीं हो पाते, जिससे प्रवासी पक्षियों का प्राकृतिक आवास खत्म हो रहा है और बंदर-मानव संघर्ष भी बढ़ रहा है।
उत्तर प्रदेश सरकार के अपने ही साइट मैनेजमेंट प्लान (2020-2030) और आगरा के वर्किंग प्लान (2024-2034) में विलायती बबूल को पर्यावरण और वन्यजीवों के लिए एक गंभीर खतरा माना गया है।
उत्तर प्रदेश सरकार के अपने ही साइट मैनेजमेंट प्लान (2020-2030) और आगरा के वर्किंग प्लान (2024-2034) में विलायती बबूल को पर्यावरण और वन्यजीवों के लिए एक गंभीर खतरा माना गया है। इन सरकारी दस्तावेजों में खुद इस प्रजाति को चरणबद्ध तरीके से हटाने और इसकी जगह बरगद, पीपल, अर्जुन और जामुन जैसे फलदार और छायादार पारंपरिक भारतीय पेड़ लगाने की सिफारिश की गई है।
मथुरा में मंजूरी तो आगरा में भी लगाएं
याचिकाकर्ता के वकील अजीत शर्मा की ओर से दायर इस मामले में कानून के समक्ष समानता (अनुच्छेद 14) का हवाला दिया गया है। याचिका में बताया गया है कि 12 दिसंबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार की ही एक अर्जी पर सुनवाई करते हुए सेंट्रल इंपावर्ड कमेटी की रिपोर्ट के आधार पर मथुरा के वनों से विलायती बबूल हटाने और इको-रेस्टोरेशन करने की मंजूरी दे दी थी।
याचिकाकर्ता का तर्क है कि जब समान भौगोलिक और पर्यावरणीय स्थिति वाले मथुरा क्षेत्र को यह राहत मिल सकती है, तो आगरा के सूर सरोवर के साथ ऐसा भेदभाव क्यों किया जा रहा है? यहां भी चौड़ी पत्ती और फलों वाले देसी प्रजाति के पौधे लगाए जाएं। डॉ. देवाशीष ने बताया कि चंबल प्रोजेक्ट के उप वन संरक्षक ने यहां बबलू हटाकर देसी प्रजाति लगाने से इन्कार कर दिया।
जबकि गैर स्थानीय हानिकारक प्रजातियों को हटाना किसी भी तरह से गैर-वानिकी कार्य या पेड़ काटना नहीं माना जाता। वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की धारा 33 के तहत मुख्य वन्यजीव वार्डन को अभयारण्य के प्राकृतिक आवास में सुधार के लिए ऐसे सुधारात्मक कदम उठाने का पूरा वैधानिक अधिकार है।
