नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क : अफगानिस्तान में बढ़ती भूख और आर्थिक बदहाली ने इंसानियत को झकझोर देने वाली तस्वीर सामने ला दी है। देश के कई हिस्सों से ऐसे मामले सामने आ रहे हैं, जहां परिवार पेट भरने, इलाज कराने और कर्ज चुकाने के लिए अपनी छोटी बेटियों को बेचने तक को मजबूर हैं।
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, अफगानिस्तान में हर चार में से तीन लोग अपनी बुनियादी जरूरतें पूरी नहीं कर पा रहे हैं। बेरोजगारी, कमजोर स्वास्थ्य व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय सहायता में भारी कटौती के कारण हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। यूएन का अनुमान है कि करीब 47 लाख लोग भुखमरी के कगार पर पहुंच चुके हैं।
‘मेरे बच्चे रोटी मांगते हैं, लेकिन मैं क्या दूं?’
बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, अफगानिस्तान के घोर प्रांत में रहने वाले अब्दुल रशीद अजीमी ने बताया कि वह अपनी सात साल की जुड़वां बेटियों रोकिया और रोहिला में से एक को बेचने पर विचार कर रहे हैं।
अब्दुल रशीद ने रोते हुए कहा, “मैं अपनी बेटियों को बेचने के लिए तैयार हूं। मैं गरीब हूं, कर्ज में डूबा हूं और बेबस हूं।”
उन्होंने कहा, “मैं काम से घर लौटता हूं तो होंठ सूखे होते हैं, भूखा-प्यासा और परेशान रहता हूं। मेरे बच्चे कहते हैं- बाबा, हमें रोटी दो। लेकिन मैं क्या दूं? काम कहां है?”
रिपोर्ट के मुताबिक, बातचीत के दौरान अब्दुल अपनी बेटी रोहिला को गले लगाकर बार-बार चूम रहे थे। उन्होंने कहा कि यह फैसला उनका दिल तोड़ रहा है, लेकिन परिवार को जिंदा रखने के लिए उनके पास कोई दूसरा रास्ता नहीं बचा।
इलाज के लिए पांच साल की बेटी का सौदा
एक अन्य पिता सईद अहमद ने बताया कि उन्हें अपनी पांच साल की बेटी शाइका को एक रिश्तेदार के हवाले करना पड़ा, क्योंकि उसके अपेंडिक्स और लीवर में सिस्ट का इलाज कराने के लिए उनके पास पैसे नहीं थे।
सईद ने कहा, “मेरे पास इलाज के पैसे नहीं थे, इसलिए मैंने अपनी बेटी को रिश्तेदार को दे दिया।” उन्होंने बताया कि 2 लाख अफगानी की व्यवस्था के तहत भविष्य में शाइका की शादी उसी रिश्तेदार के परिवार में कर दी जाएगी। फिलहाल उन्होंने सिर्फ उतने पैसे लिए, जिससे बेटी का ऑपरेशन हो सके। बाकी रकम अगले कुछ वर्षों में दी जाएगी।
क्यों बेटियों को ही बेचा जा रहा है?
रिपोर्ट के अनुसार, अफगानिस्तान में बेटों को परिवार का भविष्य और कमाने वाला माना जाता है, जबकि बेटियों को आर्थिक संकट के समय बोझ समझा जाता है।
तालिबान शासन में महिलाओं और लड़कियों की शिक्षा व रोजगार पर लगी पाबंदियों ने स्थिति और खराब कर दी है। विशेषज्ञों का कहना है कि लड़कियों की पढ़ाई बंद होने और रोजगार के अवसर खत्म होने से लैंगिक असमानता बढ़ी है।
अफगानिस्तान में कम उम्र में शादी की परंपरा पहले से मौजूद रही है। यहां दूल्हे का परिवार लड़की के परिवार को पैसे या सामान देता है। ऐसे में गरीबी और भूख से जूझ रहे परिवार बेटियों को आर्थिक राहत के साधन के रूप में देखने लगे हैं।
अंतरराष्ट्रीय मदद में कटौती से बढ़ा संकट
दो साल पहले तक लाखों अफगान परिवारों को आटा, दाल, खाना पकाने का तेल और बच्चों के पोषण आहार जैसी मदद मिल रही थी। लेकिन अमेरिका समेत कई देशों द्वारा सहायता कम किए जाने के बाद हालात तेजी से बिगड़े हैं।
