नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क : बच्चों के अपहरण और अगवा किए जाने के मामलों की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट में PIL दायर की गई है। कोर्ट ने इसे लेकर केंद्र और राज्य सरकारों से जवाब मांगा है। इस पीआईएल में पूरे देश में एक जैसा सिस्टम बनाने की मांग की गई है। इसमें तय समय में जांच, खास इन्वेस्टिगेशन और तेजी से सुनवाई के लिए अलग कोर्ट बनाने जैसी बातें शामिल हैं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र और राज्यों को जारी किया नोटिस चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची और वी. मोहना की बेंच ने वकील और याचिकाकर्ता अश्विनी कुमार उपाध्याय की याचिका पर केंद्र, राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों, शिक्षा, कानून और न्याय और गृह मंत्रालयों और लॉ कमीशन को नोटिस जारी किए। अश्विनी कुमार दुबे ने याचिका दायर कर लापता, अगवा और अपहरण किए गए बच्चों के मामलों को संभालने में सिस्टम की कमियों का जिक्र किया। इन मामलों में जांच प्रक्रिया को बेहतर बनाने के लिए एजेंसियों द्वारा तुरंत और तालमेल के साथ कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए कोर्ट के दखल की मांग की गई है। अश्विनी कुमार दुबे की याचिका में कहा गया है, ‘केंद्र और राज्यों को स्टैंडर्ड सवाल-जवाब और खास जांच प्रक्रिया बनाने का निर्देश दिया जाए। साथ ही यह सुनिश्चित किया जाए कि अपहरण और अगवा करने के मामलों की जांच ACP/SHO के पद से नीचे के अधिकारी न करें, ताकि तय समय में जांच हो सके।’ 1 साल में हो ऐसे मामलों का निपटारा सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में MLA-MP कोर्ट की तरह खास कोर्ट बनाने के निर्देश भी मांगे गए, ताकि अपहरण और अगवा करने के मामलों का फैसला एक साल के अंदर हो सके। PIL में कहा गया, ‘केंद्र और राज्यों को निर्देश दिया जाए कि वे अपहरण करने वालों, अगवा करने वालों और उनके परिवार के सदस्यों की पूरी संपत्ति का आकलन करें और उसके अनुसार मनी लॉन्ड्रिंग, बेनामी संपत्ति और काले धन से जुड़े कानूनों के तहत कार्रवाई करें।’ याचिका में कहा गया, ‘निर्देश दिया जाए और घोषित किया जाए कि अपहरण और अगवा करने के मामलों में सजा एक के बाद एक हो, न कि एक साथ, ताकि लोगों में डर पैदा हो और वे ऐसा करने से बचें।’ PIL में कहा गया है कि पुलिस अक्सर तुरंत FIR दर्ज करने में नाकाम रहती है PIL में कहा गया है कि पुलिस अक्सर तुरंत FIR दर्ज करने में नाकाम रहती है। जांच में देरी से अगवा बच्चों के मिलने की संभावना काफी कम हो जाती है और उनके तस्करी, यौन शोषण, जबरदस्ती काम कराने, गैर-कानूनी गोद लेने और शोषण के अन्य रूपों का शिकार होने का खतरा बढ़ जाता है। याचिका में हाल की कई घटनाओं का जिक्र करते हुए आरोप लगाया गया है कि बच्चों की तस्करी और गैर-कानूनी गोद लेने में शामिल संगठित नेटवर्क राज्यों की सीमाओं के पार काम करते हैं, जिसके लिए पुलिस बलों और खास एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत है। इसमें नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो (NCRB) के डेटा और दिल्ली, हैदराबाद, राजस्थान और देश के अन्य हिस्सों की घटनाओं का भी जिक्र किया गया है, ताकि यह बताया जा सके कि इस समस्या से निपटने के लिए एक समान संस्थागत प्रतिक्रिया की जरूरत है। याचिका में उठाई गई एक मुख्य शिकायत यह है कि लापता बच्चों के बारे में शिकायतों को FIR के बजाय सिर्फ गुमशुदा या लापता व्यक्ति की रिपोर्ट के तौर पर दर्ज किया जाता है। याचिकाकर्ता के मुताबिर, इस तरह के तरीकों से पूरी आपराधिक जांच शुरू होने में देरी हो सकती है। Post navigation चंद्रमा पर 2035 तक अपना स्पेस स्टेशन, पीएम मोदी ने बताया ISRO का मिशन धर्मांतरण कांड : शमीम की दबंगई से परेशान लोगो ने किया पलायन