नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क : अमेरिकी राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप ने हाल ही में दुनियाभर के देशों से अपील की है कि वे युद्धपोत भेजकर होर्मुज जलडमरूमध्य पर नियंत्रण स्थापित करें। ट्रंप ने इसपर ब्रिटेन, फ्रांस, जापान, चीन समेत कई देशों से सहयोग मांगा।
लेकिन दुनिया की सबसे शक्तिशाली नौसेना भी इस संकरे जलमार्ग पर स्थायी नियंत्रण हासिल नहीं कर सकती। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में बताया गया है कि भूगोल, ईरान की सैन्य क्षमता और लॉजिस्टिक मुश्किलें इसकी मुख्य वजह हैं।
होर्मुज: एक प्रमुख तेल मार्ग होर्मुज जलडमरूमध्य विश्व के 20-30 प्रतिशत तेल व्यापार का मुख्य मार्ग है। यह सबसे संकरे बिंदु पर मात्र 34 किलोमीटर चौड़ा है, जबकि जहाजों के लिए सुरक्षित लेन केवल 4 किलोमीटर चौड़ी हैं।इतने संकरे क्षेत्र में अमेरिकी विमानवाहक पोत जैसे निमित्ज-क्लास जहाजों को घुमाने के लिए कई किलोमीटर का टर्निंग रेडियस चाहिए, जो उन्हें ईरानी तट से हमलों के लिए आसान निशाना बनाता है।ईरान के उत्तरी तट पर ऊंचाई से ट्रक-माउंटेड खलीज फार्स बैलिस्टिक मिसाइलें (300 किमी रेंज) ओवर-द-होराइजन हमले कर सकती हैं, जो अमेरिकी नौसेना की तोपों और कुछ विमानों से तेज हैं।
ईरान का एंटी-एक्सेस नेटवर्क
ईरान की सेना, खासकर IRGC (इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड कोर), होर्मुज के लिए विशेष रूप से तैयार है। उनके पास 3,000 से अधिक एंटी-शिप क्रूज मिसाइलें (नूर, कादिर), हार्मुज-1 बैलिस्टिक सिस्टम और हजारों सस्ती नौसैनिक माइंस हैं। ये माइंस स्पीडबोट्स या मिनी-सबमरीन्स से तैनात किए जा सकते हैं।
