बांग्लादेशी हिंदुओं का वोट तय करेगा सत्ता का भविष्य, नेता लगा रहे मंदिरों के चक्कर

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नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क : शेख हसीना के पतन के बाद हिंसा की आग में झुलस रहे बांग्लादेश में 12 फरवरी को होने वाले चुनाव न केवल सत्ता का फैसला करेंगे, बल्कि अल्पसंख्यक हिंदुओं के अस्तित्व की दिशा भी तय करेंगे।

कट्टरपंथी ताकतों के उभार और लगातार जारी हिंसा के बीच मंगलवार, 10 फरवरी को प्रचार समाप्त हो गया। विडंबना देखिए कि जिस समुदाय के खून से सड़कें लाल की गईं, आज वही 7.95 प्रतिशत हिंदू आबादी ‘किंगमेकर’ बनकर उभरी है।

बांग्लादेश में हिंदुओं का दमन

घटती आबादी और बढ़ते जख्म आंकड़े गवाह हैं कि बांग्लादेश में हिंदुओं का दमन किस कदर हुआ है। 2001 की जनगणना में हिंदुओं की हिस्सेदारी 9.6 प्रतिशत थी, जो 2022 की जनगणना तक घटकर मात्र 7.95 प्रतिशत रह गई है।

मानवाधिकार समूहों के अनुसार, पिछले एक साल में हिंदुओं के खिलाफ हिंसा ‘संस्थागत’ हो गई है। लूटपाट, मंदिरों का विध्वंस और महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराधों ने समुदाय को गहरे खौफ में डाल दिया है। एक हिंसा पीडि़त हिंदू ने सिसकते हुए कहा, ‘हमें सत्ता नहीं, बस अपनी जमीन और जान की सुरक्षा चाहिए।’

जमात और BNP नेता लगा रहे मंदिरों के चक्कर

जमात और बीएनपी की मंदिर दौड़ ओपिनियन पोल्स के मुताबिक, बीएनपी और जमात-ए-इस्लामी के बीच कांटे की टक्कर है। ऐसे में हिंदू वोट ‘स्विंग फैक्टर’ बन गया है।

कल तक कट्टरवाद की पैरवी करने वाले जमात के नेता आज मंदिरों के चक्कर लगा रहे हैं और हिंदुओं को शिक्षा का स्तंभ बता रहे हैं। यह उनकी सियासी मजबूरी हो सकती है।

बहरहाल, जानकारों का मानना है कि हिंदू मतदाता जमात पर भरोसा नहीं कर सकते। राजनीतिक विशेषजों का कहना है कि ‘जमात का इतिहास 1971 के युद्ध अपराधों और हिंदू विरोधी कट्टरवाद से भरा है। अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण द्वारा इनके नेताओं पर हिंदुओं के नरसंहार के आरोप सिद्ध हो चुके हैं।’

अवामी लीग की अनुपस्थिति में बीएनपी को बढ़त पारंपरिक रूप से हिंदू मतदाता शेख हसीना की अवामी लीग के साथ रहे हैं। उनकी अनुपस्थिति में यह बड़ा वोट बैंक अब बीएनपी की ओर झुकता दिख रहा है।

हालांकि बीएनपी भी हिंसा रोकने में नाकाम रही है, लेकिन जमात की तुलना में उसे कम बुरा माना जा रहा है। नारायणगंज को छोड़कर हिंदू पूरे देश में बिखरे हुए हैं, जिससे उनकी राजनीतिक एकता कठिन है, लेकिन उनकी उच्च मतदान दर उन्हें निर्णायक बना देती है।

दीपू चंद्र दास के परिवार को मिलेगी आर्थिक और आवास सहायता

मेमन सिंह जिले के भालुका इलाके में 18 दिसंबर, 2025 को 27 वर्षीय गारमेंट वर्कर दीपू चंद्र दास को भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला था। दीपू अपने परिवार के इकलौते कमाने वाले सदस्य थे। इसलिए अंतरिम सरकार ने स्थायी मकान के निर्माण हेतु वित्तीय सहायता और अन्य समर्थन देने का वादा किया है।

यह सहायता तारकंडा के उपजिला निर्बाही अधिकारी की देखरेख में दी जाएगी। मकान के निर्माण के लिए 25 लाख टका स्वीकृत किया गया है, जिसका निर्माण राष्ट्रीय आवास प्राधिकरण द्वारा किया जाएगा।

इसके अतिरिक्त, दीपू के पिता और पत्नी को 10 लाख टका की प्रत्यक्ष वित्तीय सहायता प्रदान की जाएगी, और उनके बच्चे के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए पांच लाख टका की राशि सावधि जमा (एफडीआर) में जमा की जाएगी।

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