नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क : देश के राजनीतिक क्षितिज पर 2026 के विधानसभा चुनाव परिणामों ने एक नई इबारत लिख दी है। असम से लेकर बंगाल तक, भाजपा और उसके सहयोगियों ने अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित सीटों पर न केवल जीत दर्ज की, बल्कि विरोधियों का सूपड़ा साफ कर दिया। यह परिणाम केवल आंकड़ों का खेल नहीं, बल्कि हाशिए पर खड़े समुदायों के अटूट विश्वास की एक भावुक कहानी बयां करते हैं।
मतुआ समुदाय का भाजपा के प्रति झुकाव बंगाल में ममता बनर्जी के 15 वर्षों के शासन का अंत करते हुए भाजपा ने 207 सीटों के साथ इतिहास रचा है।
इस महाविजय की नींव आरक्षित सीटों ने रखी। राज्य की 68 एससी सीटों में से भाजपा ने 51 पर कब्जा जमाया, वहीं सभी 16 एसटी सीटें जीतकर आदिवासियों के मन को पूरी तरह जीत लिया। मतुआ समुदाय का भाजपा के प्रति एकजुट झुकाव इस बदलाव का सबसे बड़ा केंद्र रहा।
असम में राजग की ‘हैट्रिक’ में आरक्षित क्षेत्रों का योगदान
असम में भी राजग की ‘हैट्रिक’ में आरक्षित क्षेत्रों का योगदान अमूल्य रहा। परिसीमन के बाद बढ़ी हुई ताकत के साथ, राजग ने सभी 18 एसटी सीटों पर जीत का परचम लहराया।
नौ एससी सीटों में से आठ पर राजग ने कब्जा कर कांग्रेस को हाशिए पर धकेल दिया। पहाड़ी क्षेत्रों से लेकर ऊपरी असम तक, जनजातीय गौरव और विकास के वादों ने मतदाताओं के दिलों को छू लिया।
दक्षिण के सियासी समर में भी दिखी धमक
दक्षिण भारत के सियासी समर में भी राजग के सहयोगियों ने अपनी उपस्थिति मजबूती से दर्ज कराई। तमिलनाडु में अन्नाद्रमुक ने नौ एससी और एक एसटी सीट जीतकर संघर्ष को जिंदा रखा। वहीं, पुडुचेरी में एआइएनआरसी और भाजपा गठबंधन ने बहुमत का जादुई आंकड़ा पार कर सरकार बनाने की राह साफ कर ली है।
यह चुनाव परिणाम स्पष्ट संदेश देते हैं कि अब आरक्षित सीटें किसी दल विशेष की जागीर नहीं रहीं। विकास की मुख्यधारा से जुड़ने की आकांक्षा और सांस्कृतिक पहचान के सम्मान ने इन क्षेत्रों को भाजपा नीत राजग का अभेद्य किला बना दिया है। ये नतीजे सामाजिक न्याय की उस नई परिभाषा को गढ़ते दिख रहे हैं, जहां ‘सबका साथ-सबका विकास’ केवल नारा नहीं, बल्कि चुनावी धरातल की हकीकत बन चुका है।
