नई दिल्ली, डिजिटल डेस्क : सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मौखिक रूप से टिप्पणी की कि इंटरनेट मीडिया पर कुछ ऐसी संस्थाएं हैं जो मीडियाकर्मी होने का दिखावा करके ब्लैकमेलर की तरह काम करती हैं। वे उन धोखेबाज लोगों से कम नहीं हैं जो डिजिटल अरेस्ट करते हैं।
कोर्ट ने यह टिप्पणी तब की जब सालिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रधान न्यायाधीश सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ के सामने कहा कि इंटरनेट मीडिया पर कुछ ऐसे लोग हैं जो टैबलाइड व अन्य प्लेटफार्म चलाते हैं और ब्लैकमेलर की तरह काम करते हैं।
प्रधान न्यायाधीश ने मेहता से सहमति जताई और कहा, यह डिजिटल अरेस्ट जैसी किसी चीज का ही एक दूसरा रूप है। दुर्भाग्य से, इसे अभी भी अपराध नहीं माना जाता।
शीर्ष अदालत एक जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी, जिसमें हरियाणा, गुजरात, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र और असम पुलिस के उन कामों पर सवाल उठाए गए थे, जिनमें वे अपने इंस्टाग्राम पर बने आधिकारिक पेजों या हैंडल्स पर ऐसी सामग्री (फोटो और शार्ट वीडियो/रील्स) अपलोड करते हैं, जिनमें आरोपित को हथकड़ी पहने हुए, रस्सियों से बंधे हुए, लाठियों से पीटे जाते हुए, जमीन पर घुटनों पर बैठे हुए, घसीटे जाते हुए या सीढि़यों से नीचे खींचे जाते हुए दिखाया जाता है।
जस्टिस जोयमाल्या बागची ने कहा
याचिकाकर्ताओं की दलीलें सुनने के बाद कोर्ट ने कहा कि वे एक दूसरे मामले में कोर्ट के आदेश के अनुपालन के नतीजों का इंतजार करें। उस मामले में कोर्ट ने सभी राज्यों की पुलिस को एक नियमावली (मैनुअल) लागू करने का निर्देश दिया था, जिसमें ऐसे दिशानिर्देश थे जो पुलिस को आरोपित के अधिकारों का उल्लंघन करने वाली कोई भी सामग्री पोस्ट करने से रोकते हैं।
कोर्ट ने याचिकाकर्ता को एक नई और विस्तृत याचिका दायर करने की भी अनुमति दी है, जिसमें यह जानकारी शामिल हो कि कितने राज्यों की पुलिस ने कोर्ट के निर्देशों का पालन किया है।
पीठ में शामिल जस्टिस जोयमाल्या बागची ने कहा कि पुलिस की मीडिया ब्रीफिंग का दायरा स्वाभाविक रूप से उनके इंटरनेट मीडिया हैंडल्स तक भी बढ़ना चाहिए, क्योंकि ये प्लेटफार्म अब जानकारी के प्रसार के मुख्य माध्यम बन गए हैं। उन्होंने इंटरनेट मीडिया से उत्पन्न हो रही बदलती चुनौती की ओर भी इशारा किया, जिनमें पाडकास्ट और दूसरे फार्मेट शामिल हैं।
