नई दिल्ली,डिजिटल डेस्क : ईरान और इजरायल के बीच जारी युद्ध ने पश्चिम एशिया के समीकरणों को पूरी तरह बदल दिया है। इस युद्ध में इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू एक विजेता के रूप में उभर रहे हैं, जबकि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को तेल संकट और खाड़ी देशों के असंतोष का सामना करना पड़ रहा है।
नेतन्याहू के लिए यह युद्ध ‘अस्तित्व की लड़ाई’ है, जिसने इजरायल का ध्यान गाजा से हटाकर ईरान पर केंद्रित कर दिया है, जहां उन्हें व्यापक जनसमर्थन प्राप्त है। ट्रंप की रणनीतिक चूक और खाड़ी देशों पर संकट राष्ट्रपति ट्रंप ने उम्मीद की थी कि अत्यधिक दबाव के बाद ईरान आत्मसमर्पण कर देगा, लेकिन ईरान ने ‘उत्तर कोरियाई माडल’ अपनाते हुए कड़ा प्रतिरोध दिखाया है।
संघर्ष में फंसे ट्रंप
ट्रंप अब एक ऐसे संघर्ष में फंस गए हैं जहां से निकलने का कोई साफ रास्ता नहीं है। अमेरिकी खुफिया प्रमुख तुलसी गबार्ड के अनुसार, ईरान सरकार कमजोर जरूर हुई है, लेकिन वह अभी भी अमेरिकी हितों पर हमला करने में सक्षम है। इस युद्ध का सबसे बुरा प्रभाव खाड़ी देशों पर पड़ रहा है।
होर्मुज जलडमरूमध्य, जहां से दुनिया का 20 प्रतिशत तेल गुजरता है, वहां तनाव बढ़ने से वैश्विक तेल कीमतों में उछाल आने का खतरा है। खाड़ी देश, जो खुद को भविष्य के आर्थिक केंद्र के रूप में देखते हैं, अब अपनी सुरक्षा और स्थिरता को लेकर चिंतित हैं।
सैन्य सफलताएं और सहयोगियों के बीच मतभेद युद्ध के मैदान में इजरायल ने ईरान के वरिष्ठ नेतृत्व, जैसे सुरक्षा प्रमुख अली लारीजानी और खुफिया मंत्री इस्माइल खतीब को निशाना बनाकर अपनी सैन्य श्रेष्ठता साबित की है। इजरायल मुख्य रूप से परमाणु और मिसाइल ठिकानों पर हमला कर रहा है, जबकि अमेरिका होर्मुज क्षेत्र में ईरान की नौसैनिक क्षमता को कम करने में जुटा है।
हालांकि, दोनों सहयोगियों के बीच दरार भी नजर आ रही है। हाल ही में ईरान के ‘साउथ पार्स’ गैस फील्ड पर हुए हमले के बाद ट्रंप ने सार्वजनिक रूप से कहा कि अमेरिका को इसकी जानकारी नहीं थी। यह बयान इजरायल और अमेरिका के ‘एक साथ’ लड़ने के दावों के विपरीत है।
नेतन्याहू की सफलता
इजरायल जहां ईरान में अस्थिरता को स्वीकार करने के लिए तैयार है, वहीं वाशिंगटन एक लंबे युद्ध से बचना चाहता है जो वैश्विक अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा सकता है। अंतत:, नेतन्याहू की सफलता इस बात पर टिकी है कि ईरान की सत्ता गिरती है या नहीं, अन्यथा यह सैन्य बढ़त राजनीतिक बोझ भी बन सकती है।
